उन्होंने कहा कि बारहवीं तक के बच्चों को जैसे-तैसे गणित पढ़ाया जा रहा है, अच्छे शिक्षक की उनकी तलाश अब भी जारी है। दरअसल प्रिंसिपल खुद कैमिस्ट्री के शिक्षक हैं, लेकिन सांख्यिकी के शिक्षक के साथ मिलकर वे किसी तरह गणित की कक्षाएं ले रहे थे। मैंने तुरंत प्रिसिंपल से कहा कि मैं कल से आपके स्कूल में गणित पढ़ाने आऊंगा। प्रिसिंपल साहब को एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ कि किसी राज्य के डीजीपी का रिटायरमेंट प्लान ऐसा भी हो सकता है!
मैंने अगले दिन से ही अपना नया काम संभाल लिया। मैंने बारहवीं में पढ़ने वाले बच्चों को अपने ही अंदाज में पढ़ाना शुरू किया। बारहवीं में कुल दस छात्र हैं, जिनमें तीन छात्राएं भी हैं। मैं दिन में एक ही कक्षा लेता हूं, जो एक से दो घंटे का होता है। फिलहाल मैं छात्रों को कैलकुलस पढ़ाता हूं। अभी मैं इससे ज्यादा क्लास इसलिए नहीं लेता, क्योंकि लंबे समय से गणित के शिक्षक की अनुपस्थिति ने छात्रों को इस विषय के प्रति थोड़ा नीरस बना दिया है।
मैं चाहता हूं कि पहले बच्चों में गणित के प्रति रुचि पैदा हो। दरअसल अध्यापन मैं इससे पहले भी कर चुका हूं। चूंकि मैं आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से था, इसलिए हाई स्कूल के बाद मैंने कुछ समय तक एक स्कूल में गणित के शिक्षक की पार्ट टाइम नौकरी की थी। लेकिन नियमित तौर पर पढ़ाना अलग तरह की जिम्मेदारी है। बहुत लोग मुझसे सवाल करते हैं कि इतनी प्रतिष्ठित नौकरी करने के बाद मुझे स्कूल में पढ़ाने की आखिर क्या सूझी। मैं यह काम अपनी खुशी से कर रहा हूं। इससे मुझे आनंद मिलता है। इसके अलावा यह समाज को मेरी तरफ से एक छोटा-सा योगदान भी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।