मेरी सहेली जब लंबी छुट्टी के बाद स्कूल लौटी, तो आश्चर्यजनक तरीके से उसके व्यवहार में बदलाव आ चुका था। उसका वजन कम हो गया था और उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। बाल विवाह के खतरनाक परिणामों को इतने करीब से महसूस करने के बाद मैंने इस दिशा में कुछ करने का निश्चय किया।
मैं आसपास के शादी समारोहों में जाकर लड़कियों के मां-बाप से बात करने की कोशिश करने लगी। मैं उन्हें बाल विवाह के दुष्परिणाम बताने के बजाय समझाती कि लड़कियां परिवार पर बोझ नहीं हैं, बस उन्हें मौकों की जरूरत है। कई अभिभावक मुझसे यह सवाल करते कि 'क्या गारंटी है कि लड़कियों को देर तक घर में रखने से उनकी अस्मत बची रहेगी!' मैं उनको जवाब देती कि 'शादी के बाद पति द्वारा की जाने वाली जबर्दस्ती को भी बलात्कार ही माना जाता है।
केवल शादी हो जाने से आपकी बच्ची खुश नहीं रहेगी।' इस काम के साथ मैं तमाम किशोरियों से मिलकर उन्हें व्यक्तिगत रूप से यह सिखाती कि वे कैसे बाल विवाह करने से मना कर सकती हैं। यह उनका कानूनी हक है। इस तरह मैंने कई लड़कियों और उनके मां-बाप को अपनी बातों से प्रभावित कर उनकी जिंदगी बेहतर करने में मदद की। कई मर्तबा मैंने अपने काम में पुलिस की भी मदद ली। मैं अनेक एनजीओ के संपर्क में भी आई, जो इस क्षेत्र में काम कर रहे थे।
हालांकि समाज की रूढ़िवादी सोच बदल पाना बेहद मुश्किल था। लेकिन मैंने कोशिश नहीं छोड़ी। लोगों को जब यह एहसास हो गया कि मैं पीछे हटने वाले लोगों में से नहीं हूं, तो उन्होंने मुझे गंभीरता से लेना शुरू किया। लोग मुझसे छिपकर शादी के न्योते बांटते, वे हर प्रयास करते, जिससे मुझे शादी की भनक न लगे। मगर मैं बिन बुलाए मेहमान की तरह, जहां संभव हो, पहुंचती हूं और अपना काम करती हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।