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'मैं चाहता था कि 'साहबों' की सेवा में पूरी जिंदगी खपाने वाले परमशिवम का आखिरी दिन यादगार बने'

Wed, 29 Aug 2018 03:56 PM IST
टी अंबाझगन
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टी अंबाझगन
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पैंतीस साल तक नौकरी करने के बाद परमशिवम पिछले दिनों रिटायर होने वाले थे। अपने सेवाकाल में परमशिवम ने तमिलनाडु के करूर जिले के कुल आठ कलेक्टरों और दूसरे नौकरशाहों की अनेक गाड़ियां चलाई थीं। मैं मार्च में करूर जिले का कलेक्टर बना था। परमशिवम के साथ दो महीने भी नहीं बीते थे कि तीस अप्रैल उनकी नौकरी के आखिरी दिन के रूप में आ गया।

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मैं चाहता था कि 'साहबों' की सेवा में अपनी पूरी जिंदगी खपाने वाले परमशिवम का आखिरी दिन यादगार बने। सबसे पहले मैंने उनके रिटायरमेंट से पहले उन्हें दफ्तर में पार्टी दी, फिर अगले दिन उन्हें एक और सरप्राइज दिया। दरअसल मैंने परमशिवम को बोल दिया था कि आखिरी दिन दफ्तर में पत्नी के साथ आना। उस दिन जब परमशिवम का घर वापस जाने का वक्त हुआ, तो मैंने उन्हें रोका। जिस गाड़ी को चलाते हुए वह रिटायर हुए थे मैंने उस गाड़ी का पिछला दरवाजा खोला और उनसे और उनकी पत्नी से गाड़ी में बैठने का अनुरोध किया। परमशिवम ने पहले तो आनाकानी की, फिर आखिरकार उन्हें गाड़ी में बैठना पड़ा। मैंने कार के ड्राइवर की भूमिका निभाई और उन दोनों को पिछली सीट पर बिठाकर उनके घर पहुंचा। घर पहुंचकर मैंने उनके लिए बिल्कुल वैसे ही दरवाजा खोला, जैसे वर्षों से परमशिवम अपने अधिकारियों के लिए खोलते आ रहे थे। फिर मैंने उनके साथ उनके घर में चाय पीते हुए लंबी बातचीत की।

ड्राइवर समेत तमाम ऐसे सेवक होते हैं, जिन्हें उनकी निःस्वार्थ सेवा का वह फल नहीं मिलता, जिसके वे असल हकदार होते हैं। हर वक्त अपने अधिकारी के लिए गाड़ी लेकर तैयार रहने वाले इन ड्राइवरों को मैंने लगातार 18 घंटों तक काम करते देखा है। मेरा कृत्य ऐसे ही ड्राइवर को एक छोटा-सा सम्मान बस था। ऐसे ही एक दिन जन सुनवाई कार्यक्रम में मुझे पता चला कि जिले के एक सुदूर गांव में अस्सी साल की एक बूढ़ी औरत घनघोर गरीबी में अपनी जिंदगी काट रही है।

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उसकी सूचना लाने वाले लोगों ने मुझसे अपील की कि मैं उसकी कुछ मदद करूं। उनके मुताबिक, अहर्ता के बावजूद उसे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। न जाने क्यों पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरे दिमाग में सभी शिकायतों से ज्यादा उसी वृद्धा का ख्याल चलता रहा। मैं उस वृद्धा की जानकारी लेने के लिए उसके गांव की ओर चल दिया। जब मैं उस बूढ़ी औरत के घर पहुंचा, तो मुझे वहां का नजारा मेरी कल्पनाओं से भी बदतर दिखा।

उसके घर में प्लास्टिक के चंद बर्तनों के सिवा कुछ नहीं था। मुझसे उसकी विपन्नता देखी न गई। सरकारी योजनाओं के तहत मैं उसकी जो मदद कर सकता था, वह तो बाद की बात थी, मैंने तत्काल अपना टिफिन खोलकर वृद्धा के साथ खाना खाने की इच्छा जाहिर की। मेरी यह छोटी-सी पहल उसके लिए बिलकुल प्रत्याशित नहीं थी। वह मेरे साथ खाना खाने में संकोच कर रही थी। उसके पास संकोच की वजह भी थी, क्योंकि उसकी रसोई में खाना खाने के लिए बर्तन भी न थे। मैंने अपने मताहतों से दो केले के पत्ते मंगाए और उस पर दोनों के लिए खाना परोसा।

वहां से वापस आने के बाद मैंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दिए कि जितनी भी सरकारी मदद संभव है, वृद्धा को प्रदान की जाए। मैंने विशेष व्यवस्था की कि उसकी मासिक पेंशन हर महीने उसके घर तक पहुंचाई जाए, ताकि चलने-फिरने में लाचार महिला को न तो कलेक्ट्रेट और न ही बैंक के चक्कर लगाने पड़ें।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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