उसकी सूचना लाने वाले लोगों ने मुझसे अपील की कि मैं उसकी कुछ मदद करूं। उनके मुताबिक, अहर्ता के बावजूद उसे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। न जाने क्यों पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरे दिमाग में सभी शिकायतों से ज्यादा उसी वृद्धा का ख्याल चलता रहा। मैं उस वृद्धा की जानकारी लेने के लिए उसके गांव की ओर चल दिया। जब मैं उस बूढ़ी औरत के घर पहुंचा, तो मुझे वहां का नजारा मेरी कल्पनाओं से भी बदतर दिखा।
उसके घर में प्लास्टिक के चंद बर्तनों के सिवा कुछ नहीं था। मुझसे उसकी विपन्नता देखी न गई। सरकारी योजनाओं के तहत मैं उसकी जो मदद कर सकता था, वह तो बाद की बात थी, मैंने तत्काल अपना टिफिन खोलकर वृद्धा के साथ खाना खाने की इच्छा जाहिर की। मेरी यह छोटी-सी पहल उसके लिए बिलकुल प्रत्याशित नहीं थी। वह मेरे साथ खाना खाने में संकोच कर रही थी। उसके पास संकोच की वजह भी थी, क्योंकि उसकी रसोई में खाना खाने के लिए बर्तन भी न थे। मैंने अपने मताहतों से दो केले के पत्ते मंगाए और उस पर दोनों के लिए खाना परोसा।
वहां से वापस आने के बाद मैंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दिए कि जितनी भी सरकारी मदद संभव है, वृद्धा को प्रदान की जाए। मैंने विशेष व्यवस्था की कि उसकी मासिक पेंशन हर महीने उसके घर तक पहुंचाई जाए, ताकि चलने-फिरने में लाचार महिला को न तो कलेक्ट्रेट और न ही बैंक के चक्कर लगाने पड़ें।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।