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जसविंदर संघेरा: एक ऐसी महिला जिन्होंने घर-परिवार छोड़ संवारी हजारों जिंदगियां

Wed, 24 Jan 2018 08:03 AM IST
अभियान डेस्क, अमर उजाला
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Jasvinder-Sanghera
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सैंतीस साल पहले की वह रात मुझे आज भी याद है, जब मैंने अपना घर, अपना परिवार छोड़ दिया था। उस रात के कुछ दिन पहले ही मेरी मां ने मुझे एक फोटो दिखाते हुए कहा था कि तुम्हें इससे शादी करनी होगी, मैंने इससे तुम्हारी शादी का वायदा किया है। विरोध करने पर मुझे स्कूल जाने से रोक दिया गया और कमरे में बंद रखा जाने लगा।

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मैं अपने परिवार वालों से प्रेम करती थी, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि मात्र पंद्रह साल की उम्र में अपने से दोगुने बड़े किसी शख्स से शादी करूं। अपने एक दोस्त की मदद से मैं डर्बी से न्यूकैस्टल पहुंच गई। मैंने कई रातें उसकी कार में और पार्क की बेंचों पर गुजारीं। घरवालों ने पुलिस की मदद से मुझे ढूंढ निकाला। भला हो पुलिस का, जिसने मुझ पर घर वापसी का दबाव नहीं बनाया, बस घरवालों को एक फोन कॉल करके अपनी सलामती की सूचना देनी थी।

फोन पर मुझसे कहा गया कि यदि मैं घरवालों की पसंद से शादी नहीं करती, तो मैं उनकी नजर में मर गई। मजे की बात है कि इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय संस्कृति और परंपरा बताकर ब्रिटेन में फरमाया जा रहा था। पंद्रह साल की उम्र में बेघर होने का दुख मेरे लिए कष्टकारी था, लेकिन मैंने इसी कष्ट को चुना, क्योंकि मैं जानती थी कि अगर मैंने शादी कर ली, तो कल को मेरे बच्चों के साथ भी यही बातें दोहराई जाएंगी। मेरी बड़ी बहन की शादी भी ऐसे ही हुई थी और मेरे घर छोड़ने पर मेरी छोटी बहन की शादी उसी लड़के से कर दी गई।

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Jasvinder-Sanghera
​मैं चाहकर भी उस शादी को नहीं टाल सकी। इस बीच बालिग होने पर मैंने अपने उसी पुराने दोस्त से शादी कर ली। मेरी बेटी के पैदा होने पर मेरी बहन उसे देखने आई। उसने बताया था कि उसका पति उसे पीटता है। उसको ससुराल में और ज्यादा प्रताड़नाएं मिलने लगीं, जिससे क्षुब्ध होकर उसने एक दिन आत्महत्या कर ली।

इस घटना ने मुझे भीतर से ग्लानि से भर दिया। ससुराल में उसकी हालत जानते हुए भी मैं उसकी कोई मदद नहीं कर सकी थी। और कहीं न कहीं मेरे घर छोड़ने के कारण ही वह उस घर में ब्याही गई थी। बहन के अंतिम संस्कार में मैं घर पहुंची, तो किसी ने मुझसे बात नहीं की। मुझे दोबारा कभी न आने की हिदायत भी दी गई।

बहन की मौत ने मुझे वैवाहिक उत्पीड़न और जबरन शादी के खिलाफ मुहिम छेड़ने को प्रेरित किया। इस काम में मेरे पति और उनके परिवार वालों ने मेरी मदद की। मैंने 'कर्म निर्वाण' नाम की एक संस्था का गठन किया, जो ऐसी ही सताई हुई महिलाओं की मदद के लिए है। प्रत्येक महीने सैकड़ों महिलाएं हमारी हेल्पलाइन से संपर्क करके मदद पाती हैं। मैं ऐसी महिलाओं की हर संभव मदद करती हूं।

मैंने महसूस किया है कि परिवार के बगैर जिंदगी कितनी दूभर होती है। इसलिए मैं कोशिश करती हूं कि परिवार तोड़े बगैर चीजें बेहतर की जाएं। मैंने अपने अनुभवों के आधार पर एक किताब डॉटर्स ऑफ शेम लिखी, जिसे खूब पसंद किया गया। मैं आज दो बेटियों की मां हूं। मैंने उन्हें पढ़ने, शादी और जीने की पूरी आजादी दी है। मैं खुश हूं कि वर्षों पहले मैंने बेटियों पर जुल्म करने वाली परंपरा के खिलाफ आवाज उठाकर जो हिम्मत दिखाई थी, उसी की बदौलत आज न जाने कितनी जिंदगियां संवर चुकी हैं।

-ब्रिटेन में रहने वाली भारतवंशी के साक्षात्कारों पर आधारित।
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