वर्षों पहले सुनामी ने जब तांडव मचाया था, तब दक्षिण भारत के तटवर्ती शहरों में केवल इंसान ही नहीं, बल्कि दूसरे प्राणियों की जिंदगी पर भी उसका गहरा असर पड़ा था। इंसानों ने तो इतनी तरक्की कर ली है कि वे अपनी जिंदगी बहुत जल्द वापस पटरी पर ला सकते हैं।
लेकिन पशु-पक्षी क्या करें! देश के दूसरे हिस्सों के नागरिकों और सरकार ने भी सुनामी से प्रभावित लोगों के पुनर्वास में योगदान दिया। लेकिन उन बेजुबान परिंदों का क्या, जिनकी न तो सरकार है और न ही देश के दूसरे हिस्से में कोई चिंता करने वाला। तूफान ने पक्षियों की बसी-बसाई जिंदगी उजाड़ कर रख दी थी।
इंसानों की तरह कई पक्षियों ने भी उस भीषण तूफान में प्राण गंवाए थे। मगर असल दिक्कत तो उनके लिए थी, जो उस भयंकर आपदा में जिंदा बच गए थे। न उनका घर बचा और न ही पेट भरने का कोई जरिया। उस तबाही के बाद अपनी छत पर बैठकर मैंने न जाने कितने परिंदों को भूख से जूझते और तड़पकर मरते देखा था।
मैं तिरसठ वर्षीय एक कैमरा मैकेनिक हूं और चेन्नई में रहता हूं। डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से मैं अपनी छत पर परिंदों का पेट भरने की व्यवस्था करता हूं। सुनामी के बाद से लगातार जारी इस सफर की इब्तिदा चावल के चंद दानों से हुई थी।
लेकिन बहुत जल्द आश्चर्यजनक तरीके से मेरी छत पर पंछियों की तादाद बढ़ने लगी, जिनके लिए चावल के दाने कम पड़ने लगे। मैं सुनामी के प्रभाव और परिंदों की बेबसी शीघ्र ही समझ गया था। फिर क्या था, मैंने इस काम को एक नई जिम्मेदारी के तौर पर स्वीकार किया।
मैंने तय किया कि मेरी छत पर आने वाला कोई भी पक्षी भूखा नहीं रहेगा, भले ही उसके लिए मुझे कितना भी धन क्यों न खर्च करना पड़े। मैंने नियमित तौर पर लकड़ी के पात्रों में पके चावल रखना जारी रखा। समय के साथ पक्षियों की तादाद बढ़ी, तो मैंने चावल की मात्रा भी बढ़ा दी।