कुछ वक्त बाद मैंने एक कोचिंग सेंटर की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे मेरे अध्यापन का दायरा बच्चों को पार कर उन महिलाओं तक पहुंच गया, जो अपना नाम तक नहीं लिख पाती थीं। इस तरह कम से कम पच्चीस महिलाएं उर्दू में हस्ताक्षर करना और बुनियादी अक्षर ज्ञान सीख गईं। इन महिलाओं के लिए मैं अपने लंच ब्रेक का समय इस्तेमाल करती थी, क्योंकि ये महिलाएं केंद्र पर आकर औपचारिक कक्षाओं से नहीं जुड़ सकती थीं।
महिलाएं ही क्यों, लड़कियों के लिए भी कोचिंग केंद्र पर आना आसान नहीं था। अधिकतर लड़कियों को केवल घरेलू कामकाज सीखने की आजादी थी, पढ़ाई-लिखाई तो केवल लड़कों का काम माना जाता था। यह सब देखकर मैं विभिन्न परिवारों में जाकर उन्हें सभी के लिए शिक्षा की अहमियत के बारे में जागरूक करने लगी। मेरी बातों का लोगों पर फर्क पड़ा और मेरे कोचिंग सेंटर पर पढ़ने के बाद लगभग सभी बच्चे स्कूल भी जाने लगे। नतीजतन मैंने अपना कोचिंग सेंटर बंद कर दिया।
लेकिन मैंने पास-पड़ोस की महिलाओं को पढ़ाने के लिए समूह बनाकर हर रविवार को पढ़ाना जारी रखा। इस तरह लोग मुझे सिस्टर जी के नाम से पुकारने लगे। थोड़ा वक्त लगा, लेकिन शिक्षा को लेकर लोगों की मानसिकता में बदलाव आने लगा। एक सच यह भी है कि जितने लोगों ने मेरा साथ दिया, उससे कहीं ज्यादा लोग हमेशा मेरे खिलाफ रहे। कुछ लोगों ने मुझ पर मनगढ़ंत आरोप लगाकर पोस्टर तक चस्पा कर दिए।
यहां तक कि मेरे पति ने भी तलाक की धमकी दी। खुशकिस्मती यह रही कि मैं उन्हें मनाने में कामयाब रही। मेरी उम्र पचास पार हो चुकी है। मेरी कोशिशों का नतीजा है कि आज हमारे इलाके के कई स्कूलों में सैकड़ों-हजारों बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन मैं आज भी उन लोगों के बीच जाती हूं, जो अपने बच्चों, खासकर लड़कियों को स्कूल भेजने से परहेज करते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।