तिरुवल्लूर के एक बेहद पिछड़े इलाके में मेरा जन्म 1936 में हुआ था। स्कूली पढ़ाई के दौरान ही मैं प्रख्यात गांधीवादी एनजी रंगा और निर्मला देशपांडे के प्रभाव में आ चुका था। यही कारण था कि बाल्यकाल में ही मैंने बच्चों का समूह बनाकर सामाजिक सहभागिता शुरू कर दी थी। ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब बच्चों की मदद के लिए मैंने पंद्रह साल की उम्र में 'बालनंदा संघम' नामक समूह बनाया था। बाद में मैं भारत सेवक समाज में शामिल हो गया, जिसे भारतीय संसद की सिफारिशों के आधार पर योजना आयोग द्वारा गठित किया गया था।
कुल मिलाकर मैं पूरी तरह सामाजिक कामों में रम चुका था। 1970 में मैं तिरुपति आ गया, जहां मुझे सामाजिक कार्यकर्ता राजगोपाल नायडू से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। उनसे मुलाकात का ही असर था कि हमने एक नई सामाजिक संस्था-रायलसीमा सेवा समिति की स्थापना की। अपने काम को रायलसीमा (आंध्र प्रदेश का तटीय इलाका) के दायरे से बाहर फैलाने के उद्देश्य से 1981 में संस्था का नाम बदलकर राष्ट्रीय सेवा समिति कर दिया गया।
मैंने हमेशा से चाहा है कि समाज का सर्वांगीण विकास हो। हर कोई सशक्त हो, फिर चाहे किसान हो या महिलाएं, सबकी समस्याओं का ठोस समाधान किया जाए। मैंने सोचा था कि देश के सूखा प्रभावित इलाकों तक विज्ञान व प्रोद्यौगिकी की मदद से राहत पहुंचाई जाए। इसीलिए मैंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तत्वावधान में कृषि विज्ञान केंद्र की भी स्थापना की है। महिलाओं के लिए सैकड़ों महिला मंडलों का गठन करके मैंने उनकी मदद की है।
चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम होते हैं, इसलिए मैंने कढ़ाई-बुनाई, टेलीविजन-रेडियो संयोजन, खिलौने बनाने, बिस्कुट बनाने और टाइपराइटिंग में महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए कई जगहों में प्रशिक्षण-सह-उत्पादन इकाइयों की स्थापना की। इसके अलावा छोटे और सीमांत किसानों के बीच रेशम उत्पादन, बागवानी, कृषि-वानिकी, पशु पालन और डेयरी जैसे उद्यम की लोकप्रियता के लिए मैंने अनेक उपाय किए।
सामाजिक और आर्थिक विकास कार्यक्रमों में मैं कभी अकेले नहीं रहा। धर्मनिरपेक्षता और गांधीवादी सिद्धांतों को अपनाने के कारण मेरे साथ हमेशा सहयोगियों की फौज रही। पिछले पांच दशकों से अधिक समय तक अनेक काम करने की वजह से मुझे अलग-अलग तरह के कार्यक्रम डिजाइन करने का व्यापक अनुभव हो गया है, जिसे मैं दूसरे लोगों के साथ बांटता रहता हूं। मैं मानता हूं कि गरीबी लोगों को अलग-थलग करती है और इसे खत्म करने में गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका अहम तो होती है, पर निर्णायक नहीं। गांधी जी हमेशा यही कहते थे कि किसी भी समस्या को बाहरी शक्ति तब तक खत्म नहीं कर सकती, जब तक इस प्रकिया में खुद पीड़ित की भागीदारी न हो।
मैं इसी सिद्धांत का अनुसरण करता हूं। जीवन के अंतिम पड़ाव में भी मेरे पास भविष्य की कई योजनाएं हैं। 'सहाय भारती' के जरिये हम एक अखिल भारतीय संस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जो देश भर में शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम बच्चों के पुनर्वास के लिए काम कर रही है। मैं धीरे-धीरे उन गांवों से अपना ध्यान हटा रहा हूं, जहां लगता है कि पर्याप्त काम किया जा चुका है, ताकि हम नए गांवों के लिए काम कर सकें।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।