मेरी उम्मीदें परवान चढ़ती गईं और एक कमरे से शुरू हुआ स्कूल शहर के कुछ नेक लोगों की मदद से निरंतर बड़ा होता गया। पिछले दो दशक से मैं चाय की दुकान की कमाई का आधा हिस्सा अपने स्कूल पर खर्च कर रहा हूं। इस दौरान मैंने सैकड़ों बच्चों को पढ़ाया है। फिलहाल मेरे स्कूल में प्राथमिक कक्षाओं की शिक्षा दी जाती है।
यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद बच्चों को दूसरे उच्च विद्यालयों में दाखिला दिलाने की व्यवस्था भी की जाती है। आशा आश्वासन (मेरा स्कूल) में अभी करीब 80 बच्चे पढ़ रहे हैं। मैं हर रोज 600 से 800 रुपये प्रति दिन कमा लेता हूं। कम कमाई मेरे लिए कभी कोई मुद्दा नहीं रहा, मैं सिर्फ अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के बेहतर भविष्य के बारे में सोचता हूं।
स्कूल चलाने के साथ-साथ मैं शहर के एक मेडिकल कॉलेज में नियमित जाता हूं। मैं जब भी उस मेडिकल कॉलेज में जाता हूं, वहां के मरीजों के लिए दूध, पानी और दूसरी खाने-पीने की वस्तुएं ले जाता हूं। यही नहीं, मैंने मेडिकल कॉलेज के शरीर विज्ञान विभाग के लिए मरणोपरांत देहदान का भी फैसला किया है, ताकि मरने के बाद मेरा शरीर मेडिकल के छात्रों के काम आ सके। मेडिकल कॉलेज में मेरी इन तमाम गतिविधियों से प्रभावित होकर सरकार ने मुझे कॉलेज कैंपस में एक दफ्तर मुहैया कराया है। मैं उस दफ्तर का इस्तेमाल दूध गर्म करने के लिए करता हूं, ताकि यही दूध मरीजों को दे सकूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।