C.V. Raju
यहीं से मेरा काम शुरू हुआ। मैं खुद कृषि स्नातक हूं। कलाकारों की हर छोटी-बड़ी समस्या से मैं अच्छी तरह वाकिफ था। ये लोग कुदरती तरीके से 'दीवी-दीवी' पेड़ से लाल रंग निकालते थे, पर इनके विलुप्तप्राय होने के बाद सिंथेटिक रंगों ने जगह बनाई थी। टाइटेनियम डाइक्साइड जैसे रसायनों का प्रयोग होने लगा था। मैं इस नई आदत के खिलाफ था। मैं यह भी चाहता था कि मेरे गांव के कलाकार कौशलविहीन व्यक्ति की तरह बाहर जाने के बजाय गांव में ही रहें।
इन कलाकृतियों को बचाने के लिए मैंने सबसे पहले प्राकृतिक रंग वाले इन खिलौनों के बारे में जागरूकता फैलानी शुरू की। इससे धीरे-धीरे ही सही, पर कलाकारों को अपनी कला की कीमत का एहसास हुआ। लेकिन प्राकृतिक रंगों की अनुपलब्धता उनकी एक बड़ी समस्या थी। इसके लिए मैंने वस्त्रोद्योग के लिए प्रयुक्त होने वाले कुदरती रंगों के निर्माण से संबंधित प्रशिक्षण शिविरों में हिस्सा लिया।
वहां मैंने जाना कि कैसे तमाम तरह की वनस्पतियों की जड़ों, तनों, पत्तियों, फलों और बीजों से रंग बनाया जा सकता है। इस काम में मेरी मदद शिल्प परिषद ने भी की। अनेक प्रयोगों के बाद मैंने इन कुदरती रंगों को विभिन्न माध्यमों में संरक्षित करने का तरीका खोज लिया। लेकिन इतनी कवायद गांव की कला बचाने को काफी नहीं थी। उत्पाद बनाने के लिए सबसे अच्छी लकड़ी की दुर्लभता अब भी एक बड़ी चुनौती थी।
हमारे लिए यहां वन संरक्षण कमिटी काम आई, जिसने न केवल हमें तात्कालिक विकल्प मुहैया कराए, बल्कि बड़े पैमाने पर ऐसी प्रजाति के पेड़ों का रोपण भी किया। इस तरह इच्छाशक्ति, कुछ नए तरीके और सामूहिक प्रयास ने एतिकोप्पका को फिर से अपनी पहचान को समृद्ध करने का अवसर दिया है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।