इसके तहत मैंने पूर्वोत्तर राज्यों के कई समुदायों के बीच जाकर वहां के बच्चों को शिक्षा से जोड़ा है। कई तरह से सरकारी और गैरसरकारी योजनाओं के सहारे मेरा काम यों ही चलता रहा। दो साल पहले रिटायर होने के बाद मैंने सनबर्ड ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर और ज्यादा सर्मपण से काम करना शुरू किया। उसी मेहनत का नतीजा है कि आज हमारी संस्था ने पूर्वोत्तर के इक्कीस अलग-अलग जगहों पर एक हजार से भी ज्यादा बच्चों को एक तरह से गोद लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई का इंतजाम किया है।
ऐसा नहीं है कि इस काम में सरकारी मदद नहीं ली गई है, लेकिन यह जरूर है कि यदि हमारी संस्था न होती, तो ये तमाम सरकारी योजनाएं जरूरतमंद बच्चों तक मौजूदा हालत में न पहुंच पातीं। हमने मणिपुर और असम के चार स्थानों पर करीब डेढ़ सौ बच्चों के बीच पोषण योजनाएं भी चलाई हैं। इसके अलावा मणिपुर के तामेंगलॉन्ग जिले के इजीरोंग गांव में एक सौ बीस बच्चों के लिए सर्व सुविधा युक्त छात्रावास का भी निर्माण कराया है। हमारे गोद लिए छात्रों में से अनेक आगे चलकर चिकित्सा, विधि, तकनीक तथा पर्यटन के क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल कर अपने इलाके का नाम रोशन कर रहे हैं।
मैंने बत्तीस साल भारतीय सेना में नौकरी की है। उस दौरान मेरा वास्ता बंदूक और धातुओं की बुलेट से पड़ता था। अब मैं रिटायर हो चुका हूं, लेकिन बुलेट से मेरा रिश्ता बना हुआ है। बस अंतर यही है कि धातुओं की बुलेट अब सफेद चॉक की शक्ल में मुझसे रिश्ता रखती हैं। इन्हीं श्वेत बुलेट के सहारे मेरी लड़ाई जारी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।