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बचत के पैसों का बेहतरीन ब्याज: हजारों बच्चों के लिए किया पढ़ाई-लिखाई का इंतजाम

Mon, 19 Mar 2018 03:10 PM IST
क्रिस्टोफर रेगो
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Colonel Christopher Rego
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डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय पहले की बात है। मैं मणिपुर के अपने घर में आराम कर रहा था। उसी वक्त एक आदिवासी महिला ने मेरे घर के दरवाजे पर दस्तक दी। शक्ल से वह कहीं से भी भिखारी नहीं लग रही थी। लेकिन वह मेरे घर इस उम्मीद में आई थी कि मैं उसकी बेटी को पढ़ाने में आर्थिक मदद करूंगा। उसके आग्रह पर मैंने अपनी पत्नी से मशविरा करके अपनी बचत का एक हिस्सा निकालकर उस महिला की बेटी की पढ़ाई का इंतजाम किया।

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लगभग दो साल बाद वही महिला मेरे घर दोबारा आई, मगर इस बार वह कुछ लेने नहीं, बल्कि कुछ देने आई थी। उसके कृतज्ञ हाथों में एक छोटे कद्दू के साथ उसके हाथों से बुना शॉल और वे पूरे पैसे थे, जो उसने मुझसे कभी उधार लिए थे। उस दिन मुझे पहली बार यह एहसास हुआ कि मेरी बचत से किसी की जिंदगी बदल सकती है और यह ब्याज के चंद पैसों से कितना अच्छा है। इसके बाद मैं अपनी पत्नी के साथ पूर्वोत्तर भारत में कई वंचित बच्चों की जिंदगी बदलने की यात्रा पर निकल पड़ा।

मैं देहरादून की भारतीय सैन्य अकादमी से ग्रेजुएट एक रिटायर्ड कर्नल हूं। अपने सेवाकाल के दौरान मुझे देश के कई हिस्सों में काम करने का अवसर मिला। मिजोरम और मणिपुर में काम करते हुए मेरा सामना वहां के सैकड़ों-हजारों बच्चों की दुर्दशा से हुआ। पत्नी के साथ मिलकर काम करते हुए मुझे बहुत जल्द कई अन्य लोगों का भी साथ मिलता गया, जिसके फलस्वरूप एक बेहतर काम के लिए 2004 में सनबर्ड नाम से हमारी संस्था की अनौपचारिक शुरुआत हुई, जिसे दस साल बाद 2014 में पंजीकृत कराया गया। 

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इसके तहत मैंने पूर्वोत्तर राज्यों के कई समुदायों के बीच जाकर वहां के बच्चों को शिक्षा से जोड़ा है। कई तरह से सरकारी और गैरसरकारी योजनाओं के सहारे मेरा काम यों ही चलता रहा। दो साल पहले रिटायर होने के बाद मैंने सनबर्ड ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर और ज्यादा सर्मपण से काम करना शुरू किया। उसी मेहनत का नतीजा है कि आज हमारी संस्था ने पूर्वोत्तर के इक्कीस अलग-अलग जगहों पर एक हजार से भी ज्यादा बच्चों को एक तरह से गोद लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई का इंतजाम किया है।

ऐसा नहीं है कि इस काम में सरकारी मदद नहीं ली गई है, लेकिन यह जरूर है कि यदि हमारी संस्था न होती, तो ये तमाम सरकारी योजनाएं जरूरतमंद बच्चों तक मौजूदा हालत में न पहुंच पातीं। हमने मणिपुर और असम के चार स्थानों पर करीब डेढ़ सौ बच्चों के बीच पोषण योजनाएं भी चलाई हैं। इसके अलावा मणिपुर के तामेंगलॉन्ग जिले के इजीरोंग गांव में एक सौ बीस बच्चों के लिए सर्व सुविधा युक्त छात्रावास का भी निर्माण कराया है। हमारे गोद लिए छात्रों में से अनेक आगे चलकर चिकित्सा, विधि, तकनीक तथा पर्यटन के क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल कर अपने इलाके का नाम रोशन कर रहे हैं।

मैंने बत्तीस साल भारतीय सेना में नौकरी की है। उस दौरान मेरा वास्ता बंदूक और धातुओं की बुलेट से पड़ता था। अब मैं रिटायर हो चुका हूं, लेकिन बुलेट से मेरा रिश्ता बना हुआ है। बस अंतर यही है कि धातुओं की बुलेट अब सफेद चॉक की शक्ल में मुझसे रिश्ता रखती हैं। इन्हीं श्वेत बुलेट के सहारे मेरी लड़ाई जारी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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