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सुहास शिवन्नाः स्कूल से जोड़ने के लिए बच्चों को मेट्रो में घुमाया

Tue, 13 Feb 2018 07:25 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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केरल के जिस वायनाड जिले में मेरी तैनाती है, वह प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत स्थान है। प्रकृति की गोद में बसा वायनाड सुंदर तो है, लेकिन यहां के जंगलों और घाटी में रहने वाले बाशिंदों की कई समस्याएं भी हैं। यह एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है और पूरे देश की तरह यहां भी आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल करने के बहुत प्रयास किए जाते हैं, लेकिन वे प्रयास पूरे नहीं हो पाते। यहां तक कि कई आदिवासी अब भी आदिम तरीके से जीवन यापन को मजबूर हैं।

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आधुनिक सभ्यता क्या होती है, उससे इनका कोई वास्ता नहीं। मैं इस जिले का तीसवां कलेक्टर हूं। पिछले वर्ष ही मेरी यहां तैनाती हुई है। कहने को तो यहां आजादी के बाद से ही तमाम स्कूल खोले गए। उम्मीद की गई कि इन स्कूलों में आदिवासी बच्चे पढ़ेंगे और एक पीढ़ी के बाद स्थितियां बदलेंगी। राज्य सरकार द्वारा भी इस समुदाय की बेहतरी के लिए कई योजनाएं बनाई गईं। योजनाएं लागू हुईं, उनका असर भी हुआ, मगर बहुत कम। बदलाव की जो बयार अपेक्षित थी, उसकी गति धीमी रही। इसका एक प्रमाण यह भी है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अधिकांश आदिवासी बच्चे अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते। किसी न किसी कारण उन्हें बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ जाता है।

मुझे इस हकीकत का जब पता चला, तो मैंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए आदिवासी बच्चों द्वारा स्कूल छोड़ने के कारण जानना चाहा। प्रशासनिक स्तर पर मैंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को इस काम पर लगा दिया। दरअसल स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या तो हमें पता थी, पर हमारा लक्ष्य इस समस्या की जड़ तक जाना था। मैंने स्कूली रिपोर्टों पर नजर रखने के लिए, दोनों शिक्षा विभाग और आदिवासी मामलों के नोडल अधिकारी शामिल कर एक टीम का गठन किया। चूंकि ये अधिकारी स्थानीय स्तर पर कई वर्षों से लोगों के बीच रहते आए हैं, इसलिए मैंने उनसे समस्या का समाधान ढूंढने को भी कहा।
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थोड़ी-सी मशक्कत करने पर मुझे मालूम हुआ कि आदिवासियों की कुछ विशेष जातियों के बच्चों में यह समस्या ज्यादा है। ये जातियां हैं- पनिया, अदिया, कट्टूनायिका, छोलानायिका, इराली और कुरुमा। हमें यह भी पता चला कि ज्यादातर स्कूल छोड़ने वाले बच्चे 7वीं से 10वीं कक्षा के बीच के हैं। ऐसा नहीं है कि इन बच्चों को पढ़ाई से विरक्ति हो जाती है, बल्कि ये बच्चे स्कूल छोड़कर कोई छोटा-मोटा काम करके अपने घरवालों की आर्थिक मदद करते थे। मैंने इस समस्या से पार पाने के लिए ऐसे बच्चों के अभिभावकों से मिलकर उन्हें समझाना शुरू किया। उन्हें शिक्षा का महत्व बताया।

बच्चों से घुलने-मिलने के लिए मैं उनको भ्रमण के लिए कोच्चि ले गया, उन्हें शहर की नई-नवेली मेट्रों में यात्रा कराई। वह सब किया, जिससे उन पर मेरी बातों का कुछ असर पड़े। असर पड़ा भी। कई बच्चों ने दोबारा स्कूल जाना शुरू कर दिया। इस बदलाव ने मुझे और मेहनत करने की प्रेरणा दी। मैं अब नियमित तौर पर सरकारी स्कूलों का दौरा करता हूं। उनके भ्रमण की व्यवस्था करता हूं। इसके अलावा बच्चों की दूसरी समस्याएं सुनकर निवारण करने की कोशिश करता हूं। मेरी इन कोशिशों का ही नतीजा है कि वायनाड जिले में स्कूल छोड़ने वाले आदिवासी बच्चों के आंकड़ों में सुखद गिरावट देखी जा सकती है।
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-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।






 
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