हालांकि मेरा काम इतना असान नहीं है। मैं जानती थी कि मेरे मामा की तरह दूसरे मूक-बधिर बच्चे भी अच्छा खेल सकते हैं। लेकिन उन्हें बैडमिंटन कोर्ट तक लाना एक चुनौतीपूर्ण काम है। उनके मां-बाप को यह समझा पाना कि उनके बच्चे खेल सकते हैं, हमेशा मुश्किल रहा।
उनके मन में अनेक आशंकाएं रहती हैं कि किस तरह उनके बच्चे कोच से बातचीत कर पाएंगे। और बिना निर्देशों को समझे वे अच्छा खेलना कैसे सीखेंगे। मैं इसी समस्या का समाधान बनने की कोशिश में हूं। मैं फिलहाल जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स एसोसिएशन से जुड़े 250 दिव्यांग खिलाड़ियों को रोजाना सांकेतिक भाषा के जरिये खेल के बारे में जानकारी देती हूं। ये जानकारियां कोच से मिले निर्देश होते हैं, जिन्हें वे सीधे समझ नहीं पाते।
समस्याएं यहीं खत्म नहीं होतीं। यदि खिलाड़ी अच्छा खेलना सीख गए, तो देश के दूसरे हिस्सों में होने वाली प्रतियोगिताओं में उनकी प्रतिभागिता सुनिश्चित करवा पाना भी अलग चुनौती होता है। उदाहरण के लिए, जब जम्मू-कश्मीर की टीम को राष्ट्रीय खेलों में शामिल होने के लिए रांची जाना था, तब दिव्यांग बच्चों के मां-बाप ने उन्हें भेजने से इन्कार कर दिया। उस वक्त मैंने खुद बच्चों के मां-बाप को भरोसा दिलाया कि उनके बच्चे रांची में सुरक्षित रहेंगे।
कुछ परिवार वाले मेरी बात मान जाते हैं, तो कई पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं ये सारे काम बिना किसी मुआवजे या मदद के करती हूं। दरअसल जब मैं सन्नाटे में किसी बेजुबान की आवाज बनती हूं, तो मुझे अच्छा लगता है। पर इस काम की वजह से मेरी पढ़ाई प्रभावित होती है। पिछले साल कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में टीम को ले जाने के कारण मैं कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाईं। मगर सच कहूं, तो मुझे इसका मलाल नहीं है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।