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पेंशन के रुपयों से पशुओं की देखभाल

Fri, 30 Mar 2018 04:21 PM IST
महिपाल वर्मा
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महिपाल वर्मा
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दस-ग्यारह साल पुरानी बात है। मैं गोरखपुर जिले के विकासनगर में अपने मकान के पास बाहर बैठा था। इसी दौरान अचानक एक बछड़ा मेरे करीब आकर बैठ गया। वह मुझे ऐसे देख रहा था, जैसे वह मुझसे कुछ खाने को मांग रहा हो। मैंने उसे भरपेट खाना खिलाया। इसके बाद वह रोज मेरे द्वार पर आने लगा। देखते ही देखते कुछ ही महीनों में वह बड़ा हो गया। छह माह बाद उसके साथ दूसरे बछड़े-और सांड़ भी आने लगे।
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मानो उस पशु ने अपने साथियों को मेरे बारे में कुछ बताया हो! पशुओं का पेट भरना, उनका उपचार करना, उनको शरण देने का मेरा सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। मैं बीएसएनएल का रिटायर्ड सीनियर टेलीफोन ऑपरेटर हूं। पारिवारिक आपत्ति के बावजूद पेंशन के रूप में मुझे मिलने वाले 24 हजार रुपये का अधिकांश हिस्सा मैं इन पशुओं की देखभाल में खर्च कर देता हूं। मेरे लिए निराश्रित पशुओं की
सेवा परिवार और समाज से बढ़कर है। मुझे उनकी आंखों में ईश्वर दिखता है।

मैंने अपने मोहल्ले में अपने खर्च से सड़क किनारे गोशाला बनवाई है। मेरी गोशाला में फिलहाल दस गोवंश नियमित रूप से रहते हैं, लेकिन यहां दूसरे बाहरी पशुओं को भी अपना पेट भरते देखा जा सकता है। मेरा पशु प्रेम केवल गोवंशों तक सीमित नहीं है। सड़क के लावारिस 20 कुत्तों को भी मैं रोज बिस्किट, ब्रेड, रोटी, दही, मलाई तथा वे सारी चीजें खिलाता हूं, जो उन्हें पसंद हैं। एक गोशाला मैंने पहले भी बनवाई थी। गोशाला में चार बच्चों को जन्म देने वाली कुतिया भी थी। मैंने उसके ठिकाने के लिए अलग से व्यवस्था की थी।
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देर रात तक ठंड में मैं उसके पिल्लों की देखभाल के लिए अलाव जलाता था, पर किसी की भी फिक्र न करते हुए गोशाला को अतिक्रमण बताकर उजाड़ दिया गया था। इस कार्रवाई में चारों पिल्लों ने दम तोड़ दिया था। उस घटना के बाद मेरा पशु प्रेम और प्रगाढ़ हो गया। मैं पशुओं की सेवा में अपना तन-मन और धन समर्पित कर चुका हूं। मैं रात-दिन उनके लिए बेचैन रहता हूं, क्योंकि उनके अंदर इंसानों जैसा छल-कपट नहीं होता। कुछ ही दिनों पहले मैं एक पिल्ले का इलाज कराने जा रहा था, तो रास्ते में देखा कि एक सांड़ लंगड़ा रहा है।

मैंने पहले तो पिल्ले की दवा और खाने का इंतजाम किया और फिर वापस गया सांड़ की देखभाल करने। मेरे इलाज से अब वह स्वस्थ हो चला है। दरअसल राह चलते अगर कोई कुत्ता, बछड़ा या सांड़ घायल दिखता है, तो मुझसे रहा नहीं जाता। पशु बड़ा होता है, तो डॉक्टर को बुलाता हूं और छोटा है, तो उसे भाड़े की गाड़ी कर अस्पताल ले जाता हूं। इसके बाद उसकी देखभाल करने के लिए अपने पास रख लेता हूं। सांड़ों को देखते ही कोई लाठी लेकर मारने लगता है, तो कोई ईंट-पत्थर से। आखिर निराश्रित पशुओं के साथ इतनी क्रूरता क्यों? इसके बाद भी लोग उनसे अच्छे व्यवहार की उम्मीद रखते हैं।

आप किसी को दुत्कारो, मारो और बदले में प्यार चाहो, यह कैसे संभव है? किसी सांड़ ने हमला कर दिया, तो बहुत हो-हल्ला मचता है, पर कई साल हो गए, आज तक मुझे तो किसी सांड़ ने नहीं मारा। मैं अब तक 75 से अधिक सांड़ों और बछड़ों को नया जीवन दे चुका हूं। जब तक जान रहेगी, हाथ-पैर चलेंगे, मैं इनकी सेवा करता रहूंगा। सच कहूं, तो पशुओं की सेवा करने के बाद बिना भोजन किए ही मेरी भूख मिट जाती है।
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