अनुभव के लिए मैंने सबसे पहले कुछ संस्थाओं और दानदाताओं के बीच मध्यस्थ के तौर पर काम करने की शुरूआत की। मैंने संबंधित संस्थाओं को अनेक दानदाताओं को जोड़ने के लिए अपने हिसाब से कई लोकप्रिय कार्यक्रम चलाए। इस तरह महज डेढ़ साल में मैंने अपने निर्देशन में सौ से ज्यादा स्वयंसेवक तैयार कर लिए। अब मुझे कई तरह के सामाजिक कामों का अनुभव हो गया और एक दिन ऐसा आया, जब मैंने पुणे में ‘मिट्टी के रंग’ नाम से अपनी संस्था की शुरुआत कर दी, जिसका मुख्य मकसद लैंगिक और सामाजिक असमानता दूर करना है।
अपने काम के विश्वास के बल पर मैंने पिछले वर्ष राष्ट्रमंडल युवा परिषद के सदस्य के लिए आवेदन किया था, जिसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया। इस सदस्यता का फायदा यह हुआ कि मेरे सामाजिक कार्यों से जुड़े विचारों का दायरा न सिर्फ भारत, बल्कि दूसरे देशों तक भी पहुंच गया। सहयोगियों की मदद से मैं गुरुग्राम, गाजियाबाद और मुंबई में अपने केंद्र शुरू करने वाला हूं। फिलहाल मैं पुणे में 21 विधवा महिलाओं के साथ काम कर रहा हूं।
मैं इन महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए रंगोली डिजाइनिंग, बैग निर्माण, विभिन्न तरह की मूर्तियां और दूसरे तरह के हस्तशिल्प उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे रहा हूं। समय-समय पर महिलाओं का बैच बदलता रहता है, जिनमें से कुछेक को विभिन्न कंपनियों में नियमित नौकरी भी मिल चुकी है। मैं महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति भी जागरूक करता रहता हूं। इसके अलावा हमने एक सामुदायिक केंद्र भी शुरू किया है, जिसमें गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क पुस्तकालय भी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।