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मिट्टी के रंगों' से नारी सशक्तीकरण: 'मां की मुश्किलों को देखकर मिली प्रेरणा'

Sun, 09 Sep 2018 11:22 PM IST
अमित जैन
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amit jain
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मैं मूलतः महाराष्ट्र के भुसावल से हूं। मैं तीन साल का था, जब मेरे सिर से पिता का साया उठ गया था। मेरी बचपन की यादें बेहद नाजुक हैं। घर चलाने के लिए मेरी मां ने सिलाई की एक छोटी-सी दुकान खोल ली थी। हमारा परिवार कई तरह के पुराने कर्ज में भी दबा था। मेरी पढ़ाई और दूसरी जरूरतों का खर्च चाचा उठाते थे। वैसे तो घर में अमानत के तौर पर कुछ नहीं था, पर जो कुछ भी थोड़ा मूल्यवान था, मां उसे छिपाकर रखती थी कि कहीं कर्ज देने वाले हमसे छीन न ले जाएं।

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मैंने हमेशा यही देखा कि विधवा होने की वजह से मां को सभी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम से अलग-थलग रखा जाता था। यहां तक कि मेरे भाई की शादी में उन्हें मेहंदी लगाने की भी अनुमति नहीं मिली। मैंने कई बार उनका पक्ष लिया, लेकिन हर बार ताकतवर समाज के आगे खुद को बेबस पाया। भले ही मां ने अपने दर्द को कभी चेहरे की शिकन नहीं बनने दिया। मगर मैं उनके भीतर की पीड़ा बखूबी समझता था। मैंने तय किया कि मैं अपने बूते उन्हें एक बेहतर जिंदगी मुहैया कराऊंगा। मुझे पढ़ाने के लिए उन्होंने न जाने कितने समझौते किए थे! स्नातक करने के बाद मुझे नौकरी मिल गई और मैं पुणे में रहने लगा। 

मैंने मां को अपने पास रहने के लिए बुला लिया। हमारी जिंदगी धीरे-धीरे ही सही, पर बेहतर होने लगी। मेरी काबिलियत को परखते हुए मां ने एक रोज मुझसे दूसरों के लिए, खासकर विधवा महिलाओं के लिए कुछ करने की सलाह दी। मेरे पास मां की सलाह न मानने की कोई वजह नहीं थी, पर दिक्कत यह थी कि मुझे समाज सेवा का बिल्कुल भी अनुभव नहीं था। मैंने अध्ययन किया, तो पता चला कि देश में चार करोड़ से ज्यादा विधवाएं सामाजिक अलगाव का सामना कर रही हैं।

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अनुभव के लिए मैंने सबसे पहले कुछ संस्थाओं और दानदाताओं के बीच मध्यस्थ के तौर पर काम करने की शुरूआत की। मैंने संबंधित संस्थाओं को अनेक दानदाताओं को जोड़ने के लिए अपने हिसाब से कई लोकप्रिय कार्यक्रम चलाए। इस तरह महज डेढ़ साल में मैंने अपने निर्देशन में सौ से ज्यादा स्वयंसेवक तैयार कर लिए। अब मुझे कई तरह के सामाजिक कामों का अनुभव हो गया और एक दिन ऐसा आया, जब मैंने पुणे में ‘मिट्टी के रंग’ नाम से अपनी संस्था की शुरुआत कर दी, जिसका मुख्य मकसद लैंगिक और सामाजिक असमानता दूर करना है।

अपने काम के विश्वास के बल पर मैंने पिछले वर्ष राष्ट्रमंडल युवा परिषद के सदस्य के लिए आवेदन किया था, जिसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया। इस सदस्यता का फायदा यह हुआ कि मेरे सामाजिक कार्यों से जुड़े विचारों का दायरा न सिर्फ भारत, बल्कि दूसरे देशों तक भी पहुंच गया। सहयोगियों की मदद से मैं गुरुग्राम, गाजियाबाद और मुंबई में अपने केंद्र शुरू करने वाला हूं। फिलहाल मैं पुणे में 21 विधवा महिलाओं के साथ काम कर रहा हूं।

मैं इन महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए रंगोली डिजाइनिंग, बैग निर्माण, विभिन्न तरह की मूर्तियां और दूसरे तरह के हस्तशिल्प उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे रहा हूं। समय-समय पर महिलाओं का बैच बदलता रहता है, जिनमें से कुछेक को विभिन्न कंपनियों में नियमित नौकरी भी मिल चुकी है। मैं महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति भी जागरूक करता रहता हूं। इसके अलावा हमने एक सामुदायिक केंद्र भी शुरू किया है, जिसमें गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क पुस्तकालय भी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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