मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
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पालपुर रियासत के वंशज गोपाल देव सिंह ने बताया कि जमीन देने का असल उद्देश्य जंगल बचाना था। शेर आते तो जंगल बचता। कूनो को गुजरात के गिर शेरों को लाने के लिए अभयारण्य घोषित किया गया तो उन्हें अपना किला और 260 बीघा भूमि खाली करनी पड़ी। अब चीते आ रहे हैं, जिनके लिए बड़े-बड़े मैदान बनाने के लिए कई पेड़ काटे जा रहे हैं। अधिग्रहण की कार्रवाई भी सही नहीं हुई। हमारी दलीलों को हाईकोर्ट ने सही माना और हमें निचली अदालत में जाने को कहा, पर श्योपुर कलेक्टर ने सालों तक मामला अटकाए रखा। अदालत में पालपुर परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता मुरली मनोहर पाराशर का कहना है कि इस मामले की पहली सुनवाई 8 सितंबर को हो चुकी है, अगली तारीख 19 सितंबर की लगी है। हम चाहते हैं कि हमें हमारी पुश्तैनी संपत्ति वापस मिल जाए।
इन आपत्तियों के सहारे लगाई याचिका
- याचिका में बताया गया है कि जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई ही नियमानुसार नहीं हुई है। 1981 में अधिग्रहण की अधिसूचना जारी हुई थी। सिंह परियोजना के लिए जमीन ली गई थी। नियमानुसार अधिसूचना के दो साल में अधिग्रहित की गई संपत्ति का अवॉर्ड जारी करना होता है, लेकिन जिला प्रशासन ने लगभग 30 साल बाद यह अवॉर्ड जारी किया।
- 220 बीघा जमीन के बीच पालपुर रियासत का ऐतिहासिक किला, बावड़ी, मंदिर आदि संपत्ति है, जिसके बारे में अधिग्रहण में कोई जिक्र नहीं किया गया। इन चीजों का मुआवजा भी नहीं दिया गया। सरकार इन संपत्तियों का उपयोग कर रही है।
- कूनो-पालपुर सेंक्चुरी में सिंचित जमीन अधिग्रहित की गई थी, जिसके बदले में 27 बीघा असिंचित, पथरीली जमीन दी गई है। वहीं पुश्तैनी किले, मंदिर की पूजा के लिए जाने पर सेंक्चुरी प्रशासन 2000 रुपये शुल्क लेता है, तब जाने दिया जाता है।