श्री महाकालेश्वर मंदिर से सोमवार, 3 नवंबर 2025 की रात्रि 11:00 बजे परंपरागत हरिहर मिलन सवारी निकाली जाएगी। मान्यता है कि इस दिन भगवान हर (श्री महाकालेश्वर) भगवान हरि (श्री द्वारकाधीश) को सृष्टि का भार सौंपते हैं।
श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के प्रशासक प्रथम कौशिक ने बताया कि परंपरा के अनुसार, मंदिर के आंतरिक परिसर स्थित सभामंडप से रात्रि 11 बजे भगवान महाकालेश्वर की पालकी भव्य शोभायात्रा के रूप में निकलेगी। सवारी गुदरी चौक, पटनी बाजार मार्ग से होते हुए गोपाल मंदिर पहुंचेगी। गोपाल मंदिर पहुंचने पर पूजन-अर्चन के दौरान बाबा महाकालेश्वर बिल्वपत्र की माला श्री गोपालजी को भेंट करेंगे, वहीं श्री हरि तुलसी माला बाबा महाकाल को अर्पित करेंगे। पूजन के उपरांत सवारी उसी मार्ग से पुनः श्री महाकालेश्वर मंदिर लौट आएगी। सवारी के साथ मंदिर के पुजारी-पुरोहित, कर्मचारी और अधिकारी सम्मिलित होंगे। सवारी के पश्चात प्रातःकालीन भस्म आरती में भी हरिहर मिलन का आयोजन किया जाएगा।
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सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक प्रबंध
श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु मंदिर प्रशासन द्वारा सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ की जा रही हैं। सवारी मार्ग पर प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा बलों की तैनाती, पेयजल, विद्युत, चिकित्सा एवं सफाई व्यवस्था के साथ-साथ फायर ब्रिगेड दल, मोटरसाइकिल फायर ब्रिगेड और फायर एक्सटिंग्विशर कर्मी पालकी के आगे-पीछे तैनात रहेंगे। हरिहर मिलन के अवसर पर उज्जैन में भगवान महाकाल की सवारी सावन और भादो मास की सवारी की तर्ज पर निकाली जाती है। सवारी मार्ग को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। हजारों श्रद्धालु बाबा महाकाल और श्री हरि विष्णु के इस अद्भुत मिलन के साक्षी बनते हैं। आतिशबाजी और दीप सज्जा से पूरा शहर भक्ति में रंग जाता है। हर-हर महादेव और जय श्री हरि के जयकारों से संपूर्ण उज्जैन गुंजायमान हो उठता है।
क्यों मनाया जाता है हरिहर मिलन
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु पाताल लोक में विश्राम करते हैं और इस अवधि में सृष्टि संचालन की जिम्मेदारी भगवान महाकाल संभालते हैं। चातुर्मास समाप्त होने पर जब श्री हरि पुनः जागते हैं, तब सृष्टि का भार पुनः उन्हें सौंपा जाता है। इस अवसर पर भगवान महाकालेश्वर और श्री हरि विष्णु के प्रतीकात्मक मिलन के रूप में तुलसी और बिल्वपत्र की मालाओं का आदान-प्रदान किया जाता है। यह वर्ष का एकमात्र दिन होता है जब भगवान महाकाल को तुलसी और भगवान विष्णु को बिल्वपत्र अर्पित किए जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने अपने आराध्य महाकाल को एक हजार कमल अर्पित किए थे।