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उज्जैन के गयाकोठा तीर्थ की बदहाली: सात साल में करोड़ों खर्च, फिर भी श्राद्ध पक्ष में श्रद्धालु बेहाल

Thu, 24 Sep 2026 09:22 AM IST
उज्जैन ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन

सार

उज्जैन के गयाकोठा तीर्थ पर 2018 में शुरू हुई 10.63 करोड़ रुपये की विकास योजना अब तक पूरी नहीं हो सकी है। श्राद्ध पक्ष से पहले अधूरे निर्माण, कीचड़, गंदगी और मूलभूत सुविधाओं की कमी श्रद्धालुओं के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है।
 
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गया कोठा तीर्थ की हालात - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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श्राद्ध पक्ष की शुरुआत होने वाली है और देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए धार्मिक नगरी उज्जैन पहुंचने लगे हैं। लेकिन मंगलनाथ मार्ग स्थित पौराणिक एवं ऐतिहासिक गयाकोठा तीर्थ की स्थिति इस वर्ष भी जस की तस बनी हुई है। वर्ष 2018 में स्वीकृत हुए विकास कार्य 7 साल बीत जाने और करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अब तक पूरे नहीं हो सके हैं। मूलभूत सुविधाओं के अभाव और अधूरे निर्माण कार्यों के कारण बारिश के बीच आने वाले श्रद्धालुओं को भारी बदहाली और असुविधा का सामना करना पड़ेगा।

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2018 में शुरू हुआ विकास, अब तक अधूरा
बताया जाता है कि वर्ष 2018 में तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह की पहल पर गयाकोठा तीर्थ स्थल को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया था। धर्मस्व विभाग ने इसके कायाकल्प के लिए 10.63 करोड़ रुपये की योजना मंजूर की थी। निर्माण एजेंसी हाउसिंग बोर्ड ने शुरुआत में तेजी से काम कराया। शासन से मिले 4 करोड़ रुपये से पहले चरण में घाट और बुनियादी ढांचे का काम हुआ, लेकिन शेष राशि नहीं मिलने के कारण काम बंद हो गया। अब 7 साल बाद अधूरे निर्माण को पूरा करने के लिए शासन ने 6.7 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट स्वीकृत किया है।

करोड़ों खर्च, फिर भी सुविधाओं का अभाव
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए यहां सुविधाओं का घोर अभाव है। परिसर में फ्लोरिंग का काम अधूरा है। बारिश होने पर दलदल और कीचड़ की स्थिति बन जाती है। मुख्य प्रवेश द्वार, कुंड, छतरी और बाउंड्री वॉल का काम भी अधूरा है। आगमन और निर्गम की उचित व्यवस्था नहीं होने से जाम और अफरातफरी की स्थिति बनती है। कुंड और तालाब में काई जमी है, जबकि पानी से बदबू भी आती है। आसपास झाड़ियां उगी हैं और पिंडदान हॉल की टाइल्स व पत्थर टूटने लगे हैं।
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पौराणिक मान्यता से जुड़ा है गयाकोठा
स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उज्जैन में महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने गया जी की फल्गु नदी को गुप्त रूप से इसी स्थान पर प्रकट किया था। यहां विष्णुपद, सप्तऋषि मंदिर और 84 महादेवों में से एक मंदिर स्थित है। पितृपक्ष में विष्णु चरणों पर दुग्ध अर्पित कर तर्पण करने का विशेष धार्मिक महत्व है।
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निगम के दावे पर उठे सवाल
नगर निगम प्रशासन का दावा है कि श्राद्ध पक्ष से पहले सफाई व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाएगी। हालांकि, मौके पर केवल 5-6 मजदूर ही सफाई में जुटे हैं। ऐसे में अधूरे निर्माण और बदहाल व्यवस्थाओं के बीच श्रद्धालुओं के लिए तर्पण करना चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

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