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अभा सद्भावना व्याख्यानमाला: वक्ता बोले- साहित्य शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि समाज में क्रांति लाने में मददगार

Thu, 28 Nov 2024 03:50 PM IST
उज्जैन ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन

सार

उज्जैन में आयोजित 22वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने साहित्य को समाज सुधार और नैतिक मूल्यों का वाहक बताया। उन्होंने लोक साहित्य से जुड़ने की अपील की। डॉ. बालकृष्ण शर्मा ने साहित्य को मानवता का आधार बताते हुए इसके प्रेरक और परिवर्तनकारी महत्व पर प्रकाश डाला।

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अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में बात रखते वक्ता।
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विस्तार
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साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज में क्रांति लाने की मशाल है। अच्छा साहित्य समाज की सोच और संस्कारों को आकार देता है। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने साहित्य को नए आयाम दिए हैं, लेकिन इसके साथ ही साहित्य के स्तर में गिरावट की चिंताएं भी उभर रही हैं। साहित्य, जो कभी नैतिक मूल्यों और समाज सुधार का माध्यम था, अब कई बार सोशल मीडिया पर अपने उद्देश्य से भटकता दिखाई देता है। साहित्य के नाम पर बढ़ती बुराइयों ने आपसी तनाव और नैतिक पतन को जन्म दिया है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और पारिवारिक बिखराव इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हम अपने मूल और लोक साहित्य से कट गए हैं, जो हमें प्रेरणा और दिशा प्रदान करता था। वेदों के संस्कार और मूल्यों को लोक साहित्य ने आगे बढ़ाया है।
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हमें चाहिए कि लोक साहित्य से जुड़ते हुए नैतिक मूल्यों को युवाओं तक पहुंचाएं। आज हजारों चैनल और कवि सम्मेलनों की बाढ़ के बीच भी स्तरीय साहित्य की खोज जारी है। ये विचार पूर्व उपमहानिदेशक, आकाशवाणी और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने व्यक्त किए। वे भारतीय ज्ञानपीठ (माधव नगर) में स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की स्मृति में आयोजित 22वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।

साहित्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की राह विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए वाजपेयी ने कहा कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब साहित्य ने डाकुओं के हृदय परिवर्तन कर उन्हें सुधारा, महिलाओं को सशक्त बनाया और भेदभावपूर्ण कानूनों में बदलाव का आधार तैयार किया। साहित्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाने की गारंटी देता है। यह समाज, देश और सभ्यता को बेहतर बनाने का सशक्त माध्यम है। रामचरितमानस जैसे ग्रंथों ने भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला है। इसने धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मतभेदों को समाप्त करने में अहम भूमिका निभाई है।
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समारोह की अध्यक्षता करते हुए विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के पूर्व कुलगुरु डॉ. बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि कवि या साहित्यकार का संसार लौकिक होते हुए भी अलौकिक होता है। साहित्य मानव में मानवीय गुणों का समावेश करता है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ आचरण की ओर प्रेरित करना है। जो कार्य शक्ति या तलवार से संभव नहीं, वह लेखनी द्वारा किया जा सकता है। वैदिक काल से ही साहित्य समाज कल्याण का संदेश देता आया है।

कार्यक्रम की शुरुआत में संस्थान की शिक्षिकाओं ने सद्भावना गीत प्रस्तुत किए। वरिष्ठ शिक्षाविद दिवाकर नातु, संस्थान प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, श्रीमती अमृता कुलश्रेष्ठ सहित अन्य पदाधिकारियों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, कविकुलगुरु डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और कर्मयोगी स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस व्याख्यानमाला को सुनने के लिए वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी प्रेमनारायण नागर, उमानंद महाराज, एडवोकेट हरदयाल सिंह ठाकुर, एडवोकेट लाखन सिंह असावाद, संतोष सुपेकर, महेंद्र शर्मा, सोनू गेहलोत, डॉ. दिनेश जैन, डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, और अन्य कई प्रतिष्ठित व्यक्ति उपस्थित थे। संचालन प्राचार्या श्रीमती मयूरी बैरागी ने किया।
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अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में वक्ता
 

अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में मौजूद श्रोता

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