व्याख्यानमाला में विचार रखती अंजली कुलकर्णी।
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महात्मा गांधी की अहिंसा कायरता का नहीं, बल्कि असीम साहस और आत्मबल का प्रतीक थी। गांधी जी के पास ऐसे अनगिनत अनुयायियों की फौज थी, जो उनके एक बार कहने भर से ही उनका अनुसरण कर लिया करती थी। अनुयायियों की ऐसी शक्ति मिलने के बाद गांधी जी चाहते तो उन्हें शस्त्र थमाकर आजादी के आंदोलन में कूदने का कह सकते थे, किंतु गांधी जी ने उस जनशक्ति का प्रयोग अहिंसात्मक रूप से किया। यह गांधी के साहस का प्रतीक था। उनकी अहिंसा का यह सिद्धांत देश को शांति और सद्भाव के साथ स्वतंत्रता तक ले गया। गांधी जी के लिए 'राम' सिर्फ दशरथ पुत्र नहीं थे, बल्कि गांधी के लिए राम तो सच्चे अर्थों में सत्य, धर्म और नैतिकता के प्रतीक थे। उनका मानना था कि सत्य और सन्मति का पालन ही राम की वास्तविक उपासना है। उक्त विचार आंतरभारती, पुणे की अध्यक्ष अंजली कुलकर्णी ने भारतीय ज्ञानपीठ (माधव नगर) में कर्मयोगी स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा एवं पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल 'सुमन' की स्मृति में आयोजित 22वीं अ.भा.सद्भावना व्याख्यानमाला में प्रमुख वक्ता के रूप में व्यक्त किए।
आधुनिक समाज की समस्याएं और गांधी के विचारों में उनके निदान विषय पर व्यक्त अपने विचारों में कुलकर्णी ने कहा कि गांधी का आर्थिक दृष्टिकोण सामाजिक न्याय पर आधारित था। वे ऐसे अर्थशास्त्र के पक्षधर थे जो कमजोरों के हितों की रक्षा करें। उनका कहना था कि मशीनों के बढ़ते उपयोग से रोजगार छिनता है और इससे गांवों का विकास रुक जाता है। आज के समय में जब हमारे शहर भीड़ और तनाव से भर गए हैं और गांव विकास से वंचित हैं, गांधी जी के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।
गांधीजी ऐसे समाज का सपना देखते थे जो अपनी संस्कृति में रचा-बसा हो और दूसरों की संस्कृति का सम्मान भी करता हो। गांधी जी का राष्ट्रवाद केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए था। उनकी दृष्टि में भारत को एक ऐसी पहचान स्थापित करनी थी, जिसमें विविधता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का स्थान हो। समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ट शिक्षाविद़्र, डॉ .नीता तपन चौरे, ने कि वैश्विक, स्थानीय और व्यक्तिगत स्तर पर गांधी जी सदैव प्रासंगिक रहेंगे। जिस पीढ़ी में हम जन्म लेते हैं, उसकी सोच और बाहरी परिस्थितियां हमारी मानसिकता को आकार देती हैं। इसी से हमारी समस्याएं उत्पन्न होती हैं और उनके समाधान भी। कुछ समस्याए ऐसी होती हैं, जिनके समाधान सार्वभौमिक होते हैं और ऐसे में गांधी जी के विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं।
व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा सद्भावना गीतों की प्रस्तुति दी गई। वरिष्ठ शिक्षाविद दिवाकर नातु, संस्थान प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, अमृता कुलश्रेष्ठ सहित संस्थान के पदाधिकारियों द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, कविकुलगुरु डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और कर्मयोगी स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के प्रति सूतांजलि अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया गया। भारतीय ज्ञानपीठ के सद्भावना सभागृह में डिजिटल व्याख्यानमाला को सुनने के लिए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिव चौरसिया, डॉ एचएल माहेश्वरी, डॉ. स्मिता भवालकर, शीला व्यास, डॉ सदानंद त्रिपाठी, डॉ राजेंद्र नागर 'निरंतर' एवं बौद्धिकजन उपस्थित थे।