उज्जैन में धरने पर बैठे संत समाज के प्रतिनिधि।
- फोटो : सोशल मीडिया
शिप्रा नदी के शुद्धिकरण को लेकर अब संत समाज आगे आया है। अन्न त्यागने वाले महामंडलेश्वर ज्ञानदास अब तक इस अभियान में अकेले थे। अब बाकी संत भी उनके साथ आए हैं। संत समाज के प्रतिनिधि शिप्रा नदी के किनारे धरने पर बैठे हैं।
शिप्रा नदी के शुद्धिकरण के लिए लंबे समय से मांग उठ रही है। संत ज्ञानदास ने इसके लिए अन्न त्याग रखा है। पिछले दिनों उनकी तबीयत भी बिगड़ गई थी लेकिन वे संकल्प से नहीं डिगे। बुधवार को संत समाज के प्रतिनिधियों ने धरने की बात कही थी और गुरुवार से धरना शुरू कर दिया। शिप्रा नदी के किनारे संत समाज धरने पर बैठा। संतों का कहना है कि शिप्रा नदी का पानी आचमन करने लायक नहीं है। इसमें स्नान कैसे किया जा सकता है? शिप्रा में जगह-जगह नालों का दूषित पानी मिल रहा है। इसके शुद्धिकरण की मांग करते-करते साधु संतों को तीस-चालीस साल हो गए, लेकिन सरकार ने सुध नहीं ली। जब तक मुख्यमंत्री की ओर से लिखित में आश्वासन नहीं मिल जाता तब तक नहीं उठेंगे, धरना जारी रहेगा।
संतों ने दी चेतावनी
अगर जल्द ही शुद्धिकरण को लेकर सार्थक कदम नहीं उठाए तो मप्र सरकार को इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। शिप्रा नदी के शुद्धिकरण की मांग को लेकर संत ज्ञानदास 16 नवंबर से अन्न त्यागकर उपवास पर बैठे हैं। उनका कहना है कि मेरा स्वास्थ्य भले खराब हो जाए, मेरी मृत्यु हो जाए पर शिप्रा साफ होना चाहिए। हजारों करोड़ की योजनाएं चल रही हैं पर शिप्रा के लिए कोई फंड नहीं है। यहां किसी तरह की पवित्रता देखने को नहीं मिलती। प्रदेश में योगीजी जैसे मुख्यमंत्री का अभाव है। धरने में श्री क्षेत्र पंडा समिति के डॉ. रामेश्वर दास, भगवान दास, देव गिरी, गुप्त गिरी, सेवा नर्मदा गिरी, ज्ञानदास निर्मोही, राजेश त्रिवेदी आदि शामिल हुए।