सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश सरकार के उस तर्क को चौंकाने वाला और चिंताजनक बताया, जिसमें राज्य सरकार ने कहा था कि उसके वन अधिकारियों के पास रेत माफिया के आधुनिक हथियारों का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। न्यायालय ने कहा कि राज्य को लाचार होने का दावा करने या अपनी ही कमियों का सहारा लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब यही कमियां अवैध गतिविधियों, हिंसा, मानव जीवन की हानि और गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों के आवासों के अपरिवर्तनीय विनाश को बढ़ावा देती हों।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और संकटग्रस्त जलीय जीवों पर खतरे से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में दी। अदालत ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष दाखिल हलफनामे में मध्य प्रदेश सरकार ने स्वीकार किया कि वन अधिकारियों के पास रेत माफिया से निपटने के लिए पर्याप्त हथियार और उपकरण नहीं हैं, जबकि माफिया आधुनिक हथियारों और वाहनों से लैस हैं।
एमपी और राजस्थान सरकार की आलोचना की
कोर्ट ने कहा कि प्रवर्तन एजेंसियों को पर्याप्त संसाधन और सुरक्षा उपलब्ध न कराना शासन और कानून के राज की जड़ पर प्रहार करता है। इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और जनता का भरोसा कमजोर होता है। अदालत ने कहा कि अवैध रेत खनन को रोकने के लिए सबसे पहला कदम निगरानी और सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करना होना चाहिए। इसके लिए तकनीक आधारित, समन्वित और रियल-टाइम मॉनिटरिंग व्यवस्था जरूरी है।
अदालत ने चेतावनी भी दी
क्यों खास है चंबल अभयारण्य?
बता दें कि राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य लगभग 5400 वर्ग किलोमीटर में फैला एक संरक्षित क्षेत्र है, जहां घड़ियाल, लाल मुकुट कछुआ और गंगा डॉल्फिन जैसी संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं। यह अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर चंबल नदी के किनारे स्थित है।