उन्होंने कहा कि तीन मार्च को मध्यप्रदेश के 10 विधायक गायब हो गये थे, जिनमें दो बसपा, एक सपा, एक निर्दलीय एवं बाकी कांग्रेस के विधायक थे। इसके बाद वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया था कि कमलनाथ की सरकार को गिराने के लिए भाजपा नेता इन विधायकों को करोड़ों रूपये का आफर दे रहे हैं।
भाजपा ने हालांकि इस आरोप को खारिज कर दिया और दावा किया कि 26 मार्च को मध्यप्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव के मद्देनजर यह कांग्रेस के विभिन्न गुटों के बीच चल रही अंदरूनी लड़ाई का नतीजा है।
इसके बाद प्रदेश की सत्तारूढ़ कांग्रेस इन 10 विधायकों में से आठ विधायकों को वापस लाने में सफल हो गई।
उन्होंने कहा कि इसे देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मध्यप्रदेश में हुए इस सारे घटनाक्रम की निगरानी खुद की और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान एवं केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ बैठकें कर रणनीति बनाई।
उन्होंने कहा कि आखिरकार इसका भाजपा को फायदा भी मिला है, क्योंकि ज्योतिरादित्या सिंधिया ने मंगलवार को कांग्रेस छोड़ दी और उनके भाजपा में शामिल होने की संभावना है। सिंधिया के इस कदम के बाद कांग्रेस के 22 विधायकों ने भी इस्तीफे दे दिए, जिससे राज्य की कमलनाथ सरकार गिरने के कगार पर पहुंच गई है।
मध्यप्रदेश विधानसभा में 230 सीटें हैं, जिनमें से वर्तमान में दो खाली हैं। इस प्रकार वर्तमान में प्रदेश में कुल 228 विधायक हैं, जिनमें से 114 कांग्रेस, 107 भाजपा, चार निर्दलीय, दो बहुजन समाज पार्टी एवं एक समाजवादी पार्टी का विधायक शामिल हैं। इन 22 विधायकों के इस्तीफे देने के बाद कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटकर 92 रह गई है।
कमलनाथ के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार को इन चारों निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ बसपा और सपा का समर्थन है।