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मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के लिए समाधान ही समस्या बन गई

Fri, 08 Jun 2018 01:03 PM IST
बीबीसी
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बीते एक साल में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार, खास तौर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लगातार फजीहत देखकर आपको किसानों की 'बददुआओं' के असर पर भरोसा हो सकता है। बुधवार को जहां से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में नवंबर-दिसंबर में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान का जोरदार आगाज किया, उसी मंदसौर जिले के छह पाटीदार किसान पिछले साल इसी दिन पुलिस की गोलियों से मरे थे।
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तब पूरा पश्चिमी मध्य प्रदेश किसान आंदोलन से उपजी हिंसा की चपेट में था। दस-दिनों तक चलने वाले आंदोलन के दौरान दर्जनों वाहन जलाए गए, सैंकडों मकान-दुकान तबाह हो गए और हजारों टन फल, सब्जियों और दूध सडकों पर फेंके गए। सैंकड़ों किसान गिरफ्तार हुए। दर्जनों पुलिस से झड़प में जख्मी हुए।

किसानों की मांग थी कि उन्हें अपनी खेती की लागत और फसल का वाजिब दाम मिले। वे चाहते थे कि शिवराज सरकार अपनी पार्टी के वायदे के मुताबिक स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट अमल में लाए। रिपोर्ट में किसानों को फसल पर लागत का डेढ़ गुना पैसा बतौर समर्थन मूल्य देने की सिफारिश है। उनकी एक बड़ी मांग कर्ज-माफी भी थी।
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आनन-फानन की घोषणा, कारगर नहीं हुई

लेकिन शिवराज सरकार ने आंदोलन को कांग्रेस की साजिश बताई और अपना दामन पाक-साफ जताने की कोशिश की। आंदोलनकारियों का आक्रोश शांत करने के लिए खुद शिवराज सिंह चौहान भोपाल में 'सत्याग्रह' पर बैठे, हर मृतक के परिवार को अभूतपूर्व एक करोड़ रुपया मुआवजा देने की घोषणा की और पुलिस फायरिंग की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया।

एक और आयोग किसानों की फसल का दाम तय करने के लिए भी गठित करने की घोषणा कर दी। इतना सब कुछ आनन-फानन में हुआ पर किसानों की असली मांगें जस की तस बनी रहीं। नतीजतन, किसानों का गुस्सा तो बढ़ा ही, कांग्रेस को 15 साल से सत्ता पर काबिज बीजेपी सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया। तब से लगातार किसानों का आक्रोश शिवराज सरकार को बेचैन कर रहा है।

मंदसौर हिंसा के बाद सरकार ने किसानों का दिल जीतने की जितनी कोशिशें की सब नाकाम हुईं। न केवल नाकाम हुईं बल्कि उनसे किसान और बदहाल हुए। बीते एक साल में सरकार ने किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम दिलाने के लिए जो भी योजनाए लागू कीं, उनसे सरकार को तो करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ ही, व्यापारियों और भष्ट अफसरों की मौज हो गई।

समस्याओं के बीच नर्मदा परिक्रमा

इसीलिए आज मध्य प्रदेश के अन्नदाताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर है। मध्य प्रदेश की लगभग 8।5 करोड़ आबादी में 70 फीसदी किसान हैं। प्रदेश की 230 सीटों में 170 ग्रामीण हैं जहाँ किसानों के वोट निर्णायक हैं।

इन्हीं सब बातों के मद्देनजर कांग्रेस ने राहुल गांधी की मध्य प्रदेश में पहली रैली के लिए मंदसौर हिंसा की पहली बरसी का दिन चुना। खेती पर मंडराता संकट कांग्रेस के लिए गेमचेंजेर साबित हो सकता है।

अब जरा पलट कर देखते हैं कि कैसे पिछला एक साल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए एक के बाद एक सियासी मुसीबतें लाता रहा। पिछले साल की एक जून से किसानों का गुस्सा सड़क पर फूटने के पहले शिवराज और उनकी सरकार खेती पर मंडरा रहे संकट से बेखबर थे।

इधर प्याज, मूंग और सोयाबीन की जबरदस्त पैदावार के कारण इन फसलों के दाम लगातार टूट रहे थे, उधर मुख्यमंत्री अपनी 144 दिन की नर्मदा परिक्रमा यात्रा में व्यस्त थे। प्रदेश के 16 जिलों से गुजरने वाली इस राजनीतिक यात्रा के जरिये शिवराज अपना वोटबैंक पुख्ता करने की जुगत में लगे थे।

करीब 600 साधु-संतों, फिल्मी कलाकारों, खेल सितारों और सेलिब्रिटी ने राज्य सरकार के बुलावे पर इस यात्रा में शिरकत की। पूरा सरकारी अमला इसे सफल बनाने में झोंक दिया गया। मुख्यमंत्री जगह-जगह नर्मदा किनारे पूजा-पाठ में लगे रहे।

फजीहत और जगहंसाई

किसानों की बात सुनने की सरकार में किसी के पास समय नहीं थी। वहां चर्चाएं ज्यादातर नर्मदा मैया को साफ रखने और नदी के किनारे साढ़े छह करोड़ पेड़ लगा कर गिनीज बुक में विश्व रिकॉर्ड बनाने को हो रही थीं।

एक जून को किसान सडकों पर आ गए। अगले चार दिन में आंदोलन व्यापक और हिंसक हो गया। सरकार के खुफिया अमले को इसकी तीव्रता का अंदाज ही नहीं लगा। पांच जून से हालत बेकाबू होने लगे तो सरकार सक्रिय हुई। सख्ती से किसानों का दमन हुआ जिसकी एक परिणिति मंदसौर में पुलिस फायरिंग में हुई।

यहीं से शिवराज सरकार की फजीहत शुरू हुई। खुद के "सत्याग्रह" पर हुई जगहंसाई के बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि सरकार किसानों से आठ रुपए प्रति किलो की दर से प्याज खरीदेगी और दो रुपए किलो बेचेगी। घोषणा से व्यापारियों और अफसरों की बन आई।

प्रदेश के प्याज उत्पादन के ज्यादा की खरीदी हुई। लाखों टन खरीदा गया प्याज या तो खुले में या गोदामों में बर्बाद हो गया। उपार्जित फसल का बड़ा हिस्सा अफसरों और व्यापारियों ने बेच खाया। सरकारी अनुमान के मुताबिक प्याज की खरीदी में सरकार को 700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

प्याज उगाने वाले ठगे के ठगे रह गए। यही हाल मूँग और सोयाबीन की फसलों का हुआ। इन फसलों में भी किसान वाजिब दाम पाने में नाकाम रहे।

टुकड़ों-टुकड़ों वाला फैसला

कुछ दिनों बाद सरकार ने भावान्तर योजना शुरू की। किसानों से कहा गया कि उनकी फसल की बिक्री का वास्तविक मूल्य और समर्थन मूल्य का जो अंतर है वो सीधे उनके बैंक खातों में जमा हो जाएगा। अफसरों-व्यापारियों के भ्रष्ट गठजोड़ ने इस योजना का भी पलीता लगा दिया।

अधिकतर किसान समर्थन मूल्य पर अपनी फसलें नहीं बेच पाए। मंडियों पर ही व्यापारियों के हाथों ठगा गए। खरबों का नुकसान उठाने के बाद भी शिवराज सरकार समझ नहीं पा रही कि किसानों को आखिर कैसे खुश करें। इसके पास कोई एक मुकम्मल नीति या रणनीति है, ऐसा नजर नहीं आता।

टुकड़ों-टुकड़ों में कैबिनेट फैसले लेती आ रही है। कभी कोई फैसला बिजली के बिल माफ करने का होता है तो कोई डिफॉल्टर किसानों को ब्याज अदा करने में छूट देने का।

किसानों के आक्रोश की अभिव्यक्ति का मौका आया फरवरी, 2018 में हुए दो विधानसभा उपचुनावों में। बीजेपी गुना जिले की मुंगावली और शिवपुरी जिले की कोलारस सीटों पर कांग्रेस से हार गई। दोनों ग्रामीण सीटें हैं।

इन उपचुनावों के दौरान एक और घोटाला उजागर हुआ वो था वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों का। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिनके हाथों में दोनों उपचुनावों की कमान थी, वोटर लिस्ट में धांधलियों की शिकायत लेकर चुनाव आयोग पहुंचे।

शिकायतें सही पाई गईं। दोनों जिलों के कलेक्टर हटाए गए। कांग्रेस अच्छे अंतर से जीती और सरकार की भद्द पिटी।

मंत्री बनने से पहले बाबा की धमकी

इन दो पराजयों से मुख्यमंत्री उबरे भी नहीं थे कि उन्होंने एक और मुसीबत मोल ले ली। एक अप्रैल को सरकार की तरफ से खबर आई कि पांच साधु-संतों को नर्मदा के संरक्षण के लिए एक समिति बनाकर उसमे मनोनीत कर दिया गया है। पांचों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया।

इस फैसले से सियासी हलकों में खासी हलचल मची। इसकी बड़ी वजह थी कि एक दिन पहले दर्जा प्राप्त मंत्रियों में से एक कंप्यूटर बाबा ने सरकार के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा निकलने की धमकी दी थी। कंप्यूटर बाबा का आरोप था कि नर्मदा किनारे साढ़े छह करोड़ पेड़ लगाकर विश्व रिकार्ड बनाने की शिवराज सरकार की योजना सरासर फर्जी है।

पेड़ तो उतने नहीं लगे पर इसके नाम पर करोड़ों रुपयों का भष्टाचार हुआ, ऐसा बाबाओं का आरोप था। मीडिया ने बढ़-चढ़ कर इस फैसले को बाबाओं द्वारा मुख्यमंत्री का ब्लैकमेल होना बताया। झेंपे शिवराज इस पर कोई संतोषजनक सफाई नहीं दे सके।

एक मई को कांग्रेस ने अपने कद्दावर नेता कमल नाथ को मध्य प्रदेश का अध्यक्ष मनोनीत किया। साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य के चुनाव में प्रचार के अभियान की कमान सौंप दी। दोनों के मनोनयन से कांग्रेस में नई जान आ गई है। पर शिवराज के लिए ज्यादा विचलित करने वाली खबर उनकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने चार मई को दी।
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शिवराज को संकेत

शाह ने नए बीजेपी राज्य अध्यक्ष राकेश सिंह का चुनिंदा भाजपा कार्यकर्ताओं से परिचय करते हुए कहा कि पार्टी मध्य प्रदेश में अगला चुनाव कार्यकर्ता और संगठन के दम पर लड़ेगी न कि किसी चेहरे पर।

संकेत साफ था कि शिवराज सिंह चौहान बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा शायद नहीं होंगे। शिवराज ने भी इस संकेत को पकड़ा है। हाल ही में उन्होंने कहा कि चेहरे से कोई फर्क नहीं पड़ता, कामकाज पर चुनाव लड़ा जाता है।

मंदसौर में राहुल गाँधी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए प्रचार की रूप रेखा तय कर दी। कांग्रेस पहले से ही आक्रामक मुद्रा में आ चुकी है। कमलनाथ के अध्यक्ष बनने के बाद जिस तत्परता और गंभीरता से पार्टी ने फर्जी वोटरों के मुद्दे पर शिवराज सरकार को घेरा है, उससे बीजेपी बचाव की मुद्रा में है।

फिलहाल तो कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी वोटरों के होने की शिकायत की है। चुनाव आयोग ने आरोपों में दम समझकर बाकायदा जाँच भी कर ली है। इतने पैमाने पर फर्जी वोट का मिलना और उनका वोटर लिस्ट से हटाया जाना शिवराज सिंह और उनकी पार्टी के लिए शुभ संकेत तो कतई नहीं है
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