कुछ अखबारों का उल्लेख करते हुए श्री उपाध्याय ने बताया कि 'द गार्डियन' अखबार ने भारत में 1918 के स्पेन फ्लू के दुष्प्रभाव की तुलना कोरोना वायरस से की है। पहले तो अखबार ने यह छापा कि जैसी स्थिति 1918 में हुई थी कोरोना के कारण वैसी ही स्थिति भारत में दोबारा उत्पन्न होगी। इसके बाद अगली रिपोर्ट में लिखा जाता है कि भारत में संक्रमण के जो आंकड़े आए हैं उन आंकड़ों पर संदेह है। जबकि इसके बाद अगली ही रिपोर्ट में दावा किया जाता है कि भारत में 15 मई तक 13 लाख से अधिक कोरोना वायरस के मामले आएंगे।
इन सब खबरों से हम समझ सकते हैं कि इस दौर में एक खास वर्ग के कारण कितनी चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई है, जबकि हम देख पा रहे हैं कि इस अखबार की तमाम खबरें झूठी साबित हुई हैं। भारत कोरोना के खिलाफ अपनी जंग में अन्य देशों की अपेक्षा बेहतर स्थिति में है। ऐसी खबरों का वास्तविकता से कोई नाता ही नहीं है, यह केवल भारत के विषय में अपनी पूर्व निर्धारित मानसिकता के तहत प्रचारित की गई थी।
उन्होंने बताया कि विदेशी मीडिया ने भारत को लेकर एक तस्वीर बना रखी है। वह उसी माइंडसेट के आधार पर समाचार कवरेज करते हैं, जो कि गलत है। ये धारणाएं किस तरह बनी और क्यों, आखिर वे किस नजरिए से भारत को देख रहे हैं, इस पर सोचे जाने की आवश्यकता है। उनके लिए भारत आज भी सपेरों का देश ही है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के दौर में घटी कई तरह की घटनाओं जैसे तबलीगी जमात से जुड़े मुद्दों आदि को मीडिया ने अच्छे ढंग से प्रस्तुत नहीं किया। कई मुद्दों के सही तथ्य समाज के सामने नहीं आ सके और बेकार की बातों को तूल दिया गया, जिसकी जरूरत नहीं थी। भारत किस तरह से बेहतर ढंग से संघर्ष कर रहा है उन बातों को भी मीडिया में लाया जाना चाहिए। सकारात्मक पक्षों को भी समाज में रखा जाना चाहिए। मीडिया को पक्षपात से बचना चाहिए।