विंध्य के चुरहट क्षेत्र से पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह राहुल भैया छह बार विधायक और एक बार नेता प्रतिपक्ष रहे हैं। मगर एक केंद्रीय कर्मचारी से बातचीत के दौरान एक प्रत्याशी के कई प्रचार वाहन 'चुरहट में...विकल्प' की गूंज मचाते गुजर गए। प्रत्याशी के बारे में कर्मचारी ने जो बताया तो आंखें खुली की खुली रह गईं। यहीं से यह अंदाजा भी हो गया कि एमपी में विंध्य के मतदाता क्यों सबसे अधिक जागरूक माने जाते हैं। इस कर्मचारी ने बताया, नेता प्रतिपक्ष होने से 2018 में कांग्रेस के सत्ता में आने पर राहुल भैया मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार थे। ऐसे में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ने राहुल की हार के लिए पूरा जोर लगा दिया। अपने प्रिय एक विधायक को सक्रिय कर क्षेत्र में निर्णायक पटेल वोट भाजपा के पक्ष में शिफ्ट कराए। राहुल भैया हार गए।
वह बताते हैं कि अजय सिंह लगातार तीन चुनाव हार चुके हैं। इस बार भी नहीं जीते तो उनके सियासत का अवसान समझिए। यह प्रत्याशी भैया के दिमाग से निकला है। प्रत्याशी के पिता भगवा पार्टी के सांसद रहे हैं और भैया के विश्वासपात्र हैं। ऐसे में यह जितना तेज चलेगा भाजपा प्रत्याशी को उतना ही नुकसान होगा हर जगह ऐसी ही लड़ाई लड़ी जा रही है। यहां दो सांसदों और विधानसभा अध्यक्ष के साथ कई दिग्गजों की सियासत दांव पर है। भाजपा कुछ सीटें खो सकती है तो कुछ नई ला सकती हैं। कांग्रेस के साथ बीएसपी और सपा यहां की कुछ अतिरिक्त सीटों पर इस बार अच्छी चुनौती पेश कर रही है। पेश है चर्चित सीटों का हाल।
रीवा : राजेंद्र को राजेंद्र से चुनौती
विंध्य की राजधानी रहे रीवा से भाजपा ने चार बार के विधायक व पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला को फिर उतारा है। वह इस क्षेत्र का ब्राह्मण चेहरा भी हैं। रीवा संभाग के बिगड़ते समीकरण को साधने के लिए चुनाव से 3 महीने पहले उन्हें मंत्री बनाया गया। कांग्रेस ने अपने जिला अध्यक्ष राजेंद्र शर्मा को उतारा है। वह पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं । यहां आमने-सामने की लड़ाई बताई जा रही है।
चित्रकूट: केंद्रीय मंत्री की सरपरस्ती से दो अपनों में ही मुकाबला
चित्रकूट भाजपा की प्रयोगशाला रही है। नाना जी देशमुख से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक का यहां से गहरा जुड़ाव रहा है। इसके बावजूद चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र का चुनाव भाजपा 2008 में ही जीत पाई। एक केंद्रीय मंत्री की कृपा से दो बार चुनाव हारे सुरेंद्र सिंह गहरवार फिर प्रत्याशी बनकर आ गए हैं। टिकट न मिलने पर युवा नेता और भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सुभाष शर्मा डोली बसपा से मैदान में हैं। यहां कांग्रेस से मौजूदा विधायक नीलांशु चतुर्वेदी सामने हैं।
सतना: गणेश का बागी ने छीना चैन
सतना से भाजपा ने चार बार के सांसद गणेश सिंह को उतारा है। कांग्रेस विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा डब्बू भी पिछड़ी जाति से हैं। भाजपा के बागी जिला सहकारी बैंक व पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष रत्नाकर चतुर्वेदी बसपा से खड़े हैं।
देवतालाब: स्पीकर को भतीजे से चुनौती
देवतालाब सीट से विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम मैदान में है। गिरीश को सगे भतीजे जिला पंचायत सदस्य कांग्रेस प्रत्याशी पद्मेश गौतम से चुनौती मिल रही है। सपा की सीमा जयवीर सिंह अच्छा त्रिकोण बना रही हैं।
रामपुर बघेलान: पूर्व सीएम के पोते विक्रम की सीट पर कांग्रेस का ब्राह्मण कार्ड
सतना के रामपुर बघेलान क्षेत्र से मप्र के पूर्व सीएम गोविंद नारायण सिंह के पोते विक्रम सिंह विधायक और भाजपा प्रत्याशी हैं। ब्राह्मण बहुल सीट होने के बावजूद यहां कभी भी ब्राह्मण विधायक नहीं बन सका। कांग्रेस ने ब्राह्मण समाज से रामशंकर प्यासी को उतारा है।
नागौद और गुढ़ : नागेंद्र के लिए उम्र के बंधन टूटे
भाजपा 75 वर्ष से अधिक उम्र वालों को चुनाव में मौका देने से परहेज करती रही है। लेकिन नागौद से 83 वर्षीय नागेंद्र सिंह और गुढ़ से 81 वर्षीय नागेंद्र सिंह को फिर प्रत्याशी बना दिया है। नागौद से कांग्रेस की डॉ. रश्मि सिंह और कांग्रेस के बागी यादवेंद्र सिंह बसपा से आकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं। गुढ़ में सपा से चुनाव लड़ चुके कुंवर कपिध्वज सिंह कांग्रेस के प्रत्याशी हैं।
मैहर बड़ा अखाड़ा, अलग विंध्य राज्य की लड़ाई में अलग राह पर त्रिपाठी
मैहर से भाजपा विधायक रहे नारायण त्रिपाठी ने अपनी विंध्य जनता पार्टी बना ली है। खुद मैहर से खड़े हैं और करीब दो दर्जन से अधिक सीटों पर प्रत्याशी उतार दिए हैं। सपा प्रदेश अध्यक्ष रहे नारायण पहले सपा से विधायक हुए। 2013 में कांग्रेस से विधायक बने। 2018 में भाजपा से जीते। लेकिन विंध्य के मुद्दे को लेकर चुनाव से पहले भाजपा से भी इस्तीफा दे दिया। भाजपा ने पिछले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे श्रीकांत चतुर्वेदी को टिकट दे दिया। चुनाव से ठीक पहले मैहर को अलग जिला बनाया गया है। नारायण कई सीटों पर भाजपा को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
त्योंथर : श्रीनिवास के पोते की कड़ी परीक्षा
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और व्हाइट टाइगर के नाम से मशहूर रहे श्रीनिवास तिवारी भाजपा के लिए चुनौती रहे। उनके बेटे सुंदरलाल तिवारी भी कांग्रेस से सांसद और विधायक रहे हैं। अब तिवारी के पोते सिद्धार्थ तिवारी राज को भाजपा ने मौका दिया है। भाजपा के बागी देवेंद्र सिंह बसपा से आ गए हैं। उन्हें मिला वोट भाजपा या कांग्रेस की जीत-हार में अहम होगा।
सीधी में टेढ़ी लड़ाई
सीधी में भाजपा ने अपने मौजूदा विधायक का टिकट काटकर सांसद रीती पाठक को मैदान में उतारा है। विधायक केदारनाथ शुक्ला निर्दलीय चुनौती पेश कर रहे हैं। रीति की जीत पक्का करने के लिए पीएम मोदी ने मंगलवार को सीधी में बड़ी जनसभा की।
सिहावल : कांग्रेस के नए क्षत्रप की प्रतिष्ठा दांव पर
संभाग की सिहावल सीट कांग्रेस के उभरते पिछड़े चेहरे मौजूदा विधायक और पूर्व मंत्री इंद्रजीत कुमार पटेल के बेटे कमलेश्वर पटेल के चुनाव लड़ने से चर्चा में है। कांग्रेस पूर्व मंत्री कमलेश्वर को पिछड़े चेहरे के रूप में आगे बढ़ा रही है। कांग्रेस ने परिवर्तन यात्रा की जिम्मेदारी कमलेश्वर को सौंपी थी। भाजपा ने पूर्व विधायक विश्वामित्र पाठक को उतारा है। यहां ब्राह्मण के बाद पटेल मतदाता ही सबसे ज्यादा बताए जाते हैं।
शहडोल : आदिवासियों के बीच सीधी लड़ाई
संभाग की आठ सीटों में से कोतमा छोड़कर बाकी सात आदिवासियों (एसटी) के लिए सुरक्षित हैं। यहां की अनूपपुर सीट पर राज्य के खाद्य उपभोक्ता मामलों के मंत्री बिसाहूलाल सिंह व मानपुर में जनजातीय कल्याण मंत्री मीना सिंह एक बार फिर मैदान में हैं। छह बार के विधायक बिसाहूलाल के सामने कांग्रेस ने सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी रमेश सिंह को मौका दिया है। यहां सीधी लड़ाई है।
प्रमुख पांच मुद्दे
- नौ जिलों को मिलाकर विंध्य प्रदेश बनाने की मांग।
- प्रोफेशनल उच्च शिक्षण संस्थान की स्थापना।
- उद्योग होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं।
- कृषि प्रधान क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की कमी।
- आदिवासियों को योजनाओं का लाभ और आवास मिलने में मुश्किलें।
2018 के चुनाव नतीजे
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने विंध्य क्षेत्र की कुल 30 सीटों में से 24 पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस सिर्फ छह सीट जीत पाई थी। रैंगाव उपचुनाव के बाद कांग्रेस की सीटें सात हो गई थीं।