धनतेरस पर ओंकारेश्वर के कुबेर भंडारी मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं ने दर्शन-पूजन किया। इस अवसर पर 108 कुंडीय श्री कुबेर महालक्ष्मी महायज्ञ आयोजित हुआ, जिसमें करीब 200 जोड़ों ने आहुतियां दीं। 34 वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत महाभिषेक, महाआरती और भंडारे का आयोजन भी हुआ।
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धनतेरस के पावन अवसर पर ज्योतिर्लिंग नगरी ओंकारेश्वर स्थित कुबेर भंडारी मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। भक्तों ने भगवान कुबेर भंडारी महादेव के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान 108 कुंडीय श्री कुबेर महालक्ष्मी महायज्ञ का भी आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 200 जोड़ों ने आहुतियां दीं। मांधाता विधायक नारायण पटेल ने भी मंदिर पहुंचकर पूजन-अर्चन किया।
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दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन सुबह चार बजे भगवान कुबेर भंडारी महादेव का महाभिषेक किया गया। इसके बाद मां नर्मदा और मां गंगा का पूजन-अर्चन हुआ। सुबह छह बजे 108 कुंडीय श्री कुबेर महालक्ष्मी महायज्ञ प्रारंभ हुआ। यज्ञ मंडप में एक साथ 108 हवन कुंडों से उठती अग्नि की लपटें और गूंजते मंत्र विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। महायज्ञ में शामिल श्रद्धालुओं ने विश्व कल्याण और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए आहुतियां दीं। सुबह 9:30 बजे महायज्ञ की महाआरती संपन्न हुई। आरती के बाद भक्तों को रुद्राक्ष और ज्वार से युक्त कुबेर सिद्धि पैकेट वितरित किए गए। आयोजन के अंतर्गत विशाल भंडारे का भी आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की।
कुबेर भंडारी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।
- फोटो : अमर उजाला
धार्मिक परंपरा और आस्था का केंद्र
यह धार्मिक आयोजन 34 वर्षों से चली आ रही निरंतर परंपरा का हिस्सा है। आयोजन से जुड़े पंडित मनोज बर्वे ने बताया कि इसकी शुरुआत करीब 34 वर्ष पहले लगभग 25 लोगों की सहभागिता से हुई थी। उस समय सीमित संख्या में श्रद्धालु जुड़ते थे। धीरे-धीरे भगवान कुबेर के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती गई। आज यह आयोजन हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता वाला धार्मिक उत्सव बन चुका है। पंडित बर्वे के अनुसार, भगवान कुबेर को ज्वार अर्पित करने की विशेष धार्मिक मान्यता है।
प्राचीन मंदिर का जलमग्न होना और नया निर्माण
कुबेर भंडारी मंदिर की धार्मिक यात्रा ओंकारेश्वर बांध के निर्माण से भी जुड़ी है। भगवान कुबेर भंडारी का प्राचीन मंदिर लंबे समय तक आस्था का केंद्र रहा। वर्ष 2006 में ओंकारेश्वर बांध के बैकवाटर में जलस्तर बढ़ने के कारण प्राचीन मंदिर जलमग्न हो गया। इससे श्रद्धालुओं के लिए दर्शन और पूजा-अर्चना प्रभावित हुई। भक्तों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ओंकारेश्वर में ही नए कुबेर भंडारी मंदिर का निर्माण करवाया गया। नए मंदिर में विधिवत पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियां पुनः प्रारंभ हुईं।
आस्था की निरंतरता और सामूहिक सहभागिता
प्राचीन मंदिर के जलमग्न होने के बावजूद भगवान कुबेर की आराधना की परंपरा बनी रही। नया मंदिर आज श्रद्धालुओं के लिए दर्शन-पूजन का प्रमुख स्थान बन रहा है। धनतेरस पर उमड़ी हजारों भक्तों की भीड़ इस बात का प्रमाण है। यह दर्शाता है कि मंदिर का स्थान बदल सकता है, लेकिन भक्तों की श्रद्धा और विश्वास को नहीं डुबोया जा सकता। यह आयोजन आस्था, परंपरा और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक बन गया है।