सुसनेर विधानसभा से पूर्व विधायक संतोष जोशी ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है।
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आगर मालवा जिले में भाजपा को एक और झटका लगा है। सुसनेर से विधायक रह चुके संतोष जोशी में पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इतना ही नहीं उन्होंने जो दावा किया है, वो भाजपा की परेशानी और बढ़ा रहा है। उन्होंने सुसनेर विधानसभा सीट से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ते हुए जीतने का दावा भी किया है।
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी भले ही अपनी पहली सूची जारी कर चुकी है, पर ये उसके लिए मुसीबत बनती जा रही है। कई उम्मीदवारों को अपने ही कार्यकर्ताओं का विरोध झेलना पड़ रहा है। जिन्हें टिकट नहीं मिला, वो भी धमकी देने लगे हैं। कई जगह भाजपा नेता अपने इस्तीफे की पैशकश भी कर चुके हैं। ऐसा ही झटका आगर जिले की सुसनेर विधानसभा से पूर्व विधायक संतोष जोशी में भारतीय जनता पार्टी को दिया है, जहां उन्होंने पार्टी की प्राथमिकता सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। साथ ही उन्होंने सुसनेर विधानसभा सीट से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ते हुए जीतने का दावा भी किया है।
बता दें पूर्व विधायक संतोष जोशी सुसनेर विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2008 में विधायक और गौसंवर्धन बोर्ड के उपाध्यक्ष के साथ-साथ लगभग 18 वर्षों से संघ के प्रचारक भी रहे हैं। जोशी का कहना है कि वे संघ के पूर्व प्रचारकों के साथ पार्टी बनाकर चुनाव भी लड़ सकते हैं। सुसनेर क्षेत्र से गत 10 वर्षों से विधायकों के कार्यकाल से नाराज होकर उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दिया है। जोशी ने कहा कि वे क्षेत्र में घूमते हैं, अराजकता का माहौल है और लोगों में निराशा भी है। लोगों का यह भाव भी है कि वे चुनाव लड़ें, क्योंकि उनके पूर्व कार्यकाल को जनता ने भी स्वीकारा है।
संतोष जोशी ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि वे भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं, अगर पार्टी उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर देती है तो वे निःसंकोच चुनाव लड़ेंगे। फिलहाल उन्होंने इस्तीफा दे दिया है और वह निर्दलीय चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं। चुनावी मुद्दों को लेकर जोशी ने कहा कि क्षेत्र में संतरा बहुत है, जिसके लिए प्रोसेसिंग यूनिट, उद्योगों का विस्तार और बेरोजगार घूम रहे युवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था करने के मुद्दों पर वे चुनाव लड़ेंगे। उनके कार्यकाल में किटखेड़ी बांध बनाया गया था, जो कि 6 माह में ही बनकर तैयार हो गया था, इससे प्रभावित किसानों को तत्काल मुआवजा भी मिला और नई जगह पर उन्हें विस्थापित भी कर दिया गया था, लेकिन कुंडलिया डैम से प्रभावित किसानों को अब तक दर-दर भटकना पड़ रहा है।