वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार देर रात नई अफीम नीति (वर्ष 2026-27) की घोषणा की है।
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मंदसौर/नीमच। वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार देर रात नई अफीम नीति (वर्ष 2026-27) की घोषणा की है। इस नीति से अफीम किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। किसानों को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं मिला है। लंबे समय से चली आ रही अफीम के भावों में बढ़ोतरी की मांग भी पूरी नहीं हुई है।
नई नीति में नियमों को कड़ा किया गया है। इससे चीरा पद्धति के पट्टे घटने की संभावना है। वहीं, केंद्रित पोस्त पुआल (सीपीएस) पद्धति का दायरा तेजी से बढ़ाया जाएगा। पिछले साल अफीम की औसत 4.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी। इसे बढ़ाकर अब 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है। चीरा पट्टे के लिए नई शर्त रखी गई है। जिन किसानों की औसत 4.4 किलोग्राम या उससे अधिक होगी, उन्हें ही पारंपरिक चीरा लगाने वाला पट्टा मिलेगा। सीधे तौर पर 2 फीसदी औसत बढ़ा दी गई है। जिन किसानों की अफीम की औसत 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम रही है, उनके चीरे वाले लाइसेंस/पट्टे पूरी तरह काट दिए जाएंगे।
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पट्टों का नया गणित
4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक औसत देने वाले किसानों को 10 आरी का चीरा लगाने वाला पट्टा मिलेगा। 3 किलोग्राम से लेकर 4.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक औसत देने वाले किसानों को चीरे की बजाय सीपीएस पद्धति में 5 आरी के पट्टे दिए जाएंगे। वर्ष 1998 से 2003 तक के दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर औसत वाले मामलों में छूट दी गई है। ऐसे किसानों को भी सीपीएस पद्धति का 5 आरी का पट्टा मिलेगा। यह बदलाव किसानों के लिए महत्वपूर्ण है।
डोडा पोस्त के नियम
डोडा पोस्त के उत्पादन को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। जिन किसानों ने 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या उससे अधिक डोडा पोस्त का उत्पादन दिया है, उनके सीपीएस पट्टे बहाल किए जाएंगे। उन्हें 5 आरी का पट्टा मिलेगा। इससे कम डोडा पोस्त देने वाले किसानों के पट्टे काट दिए जाएंगे। यह नियम डोडा पोस्त उत्पादकों को प्रभावित करेगा।
सीपीएस पट्टों की वृद्धि
कृषि जानकारों के अनुसार, सीपीएस पट्टों की संख्या में भारी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि 4.4 किलोग्राम से कम और 3 किलोग्राम तक औसत देने वाले पारंपरिक चीरा पद्धति के किसानों को अब अनिवार्य रूप से सीपीएस पद्धति में स्थानांतरित किया जा रहा है। आने वाले सत्र में यह बदलाव स्पष्ट दिखेगा। कड़े पैमानों के कारण किसानों में मायूसी का माहौल है। यह नीति किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।