भारत के जंगलों में चीतों के फिर से दौड़ने में अभी लगेगा समय
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भारत में चीतों की वापसी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। नामीबिया से जो चीते भारत आ रहे थे, उनमें पालतू चीते भी थे। हाल ही में इन चीतों का मेडिकल टेस्ट कराया गया। पता चला कि कुछ चीते घरेलू हैं। उन्हें हमेशा पिंजरे में ही रखा गया है। ऐसे में उन्हें शिकार करना नहीं आता। भारत ने साफ कह दिया है कि ऐसे चीते चाहिए जो जंगल में शिकार कर सके। पालतू चीतों को जंगल में नहीं छोड़ सकते।
देश में सात दशक बाद चीते आ रहे हैं। मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क में तैयारियां पूरी हो गई है। चीता प्रोजेक्ट के तहत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाना है। नामीबिया से आठ चीते (चार नर और चार मादा) मध्यप्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में आने हैं। पांच साल में पचास चीतों को पूरे देश में बसाया जाएगा। दक्षिण अफ्रीका से भी चीतों को लाया जाना है। नामीबिया से भारत भेजे जाने वाले कुछ चीते शुरुआत से ही कैद करके रखे गए हैं। वह जंगल में शिकार नहीं कर सकते। वहीं, कुनो में तेदुएं भी हैं। जिन बाड़ों में चीतों को रखा जाना है, वहां भी तेंदुएं हैं। तेंदुओं और चीतों की लड़ाई में पालतू चीतों का बच पाना मुश्किल होगा। अब इन चीतों की जगह दूसरे चीते लाए जाएंगे। अब चीतों के भारत आने में थोड़ा और समय लग सकता है। भारत सरकार का नामीबिया सरकार से चीतों को लाने को लेकर अनुबंध हो चुका है। अभी दक्षिण अफ्रीका सरकार की तरफ से अनुबंध की प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। कूनो नेशनल पार्क में चीतों के लिए 500 हैक्टेयर में बाड़ा बनाया गया है। 10 अलग-अलग कंपार्टमेंट हैं। यहां पर बाड़े में घुसे तेंदुओं को भी अभी तक नहीं निकाला जा सका है।
748 वर्ग किमी में फैला है कूनो-पालपुर पार्क
कूनो-पालपुर नेशनल पार्क 748 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह छह हजार 800 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले खुले वन क्षेत्र का हिस्सा है। चीतों को लाने के बाद उन्हें सॉफ्ट रिलीज में रखा जाएगा। दो से तीन महीने बाड़े में रहेंगे। ताकि वे यहां के वातावरण में ढल जाए। इससे उनकी बेहतर निगरानी भी हो सकेगी। चार से पांच वर्ग किमी के बाड़े को चारों तरफ से फेंसिंग से कवर किया गया है। चीता का सिर छोटा, शरीर पतला और टांगे लंबी होती हैं। यह उसे दौड़ने में रफ्तार पकड़ने में मददगार होती है। चीता 120 किमी की रफ्तार से दौड़ सकता है।
1948 में आखिरी बार देखा गया था चीता
भारत में आखिरी बार चीता 1948 में देखा गया था। इसी वर्ष कोरिया राजा रामनुज सिंहदेव ने तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद भारत में चीतों को नहीं देखा गया। इसके बाद 1952 में भारत में चीता प्रजाति की भारत में समाप्ति मानी।
1970 में एशियन चीते लाने की हुई कोशिश
भारत सरकार ने 1970 में एशियन चीतों को ईरान से लाने का प्रयास किया गया था। इसके लिए ईरान की सरकार से बातचीत भी की गई। लेकिन यह पहल सफल नहीं हो सकी। केंद्र सरकार की वर्तमान योजना के अनुसार पांच साल में 50 चीते लाए जाएंगे।