मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार चुनाव मोड में आ गई है। अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और 22% आदिवासी वोटरों को खुश करने के लिए शिवराज सरकार ने तीन बड़ी योजनाओं को मंजूरी दी है। इनमें आदिवासी युवाओं को स्वरोजगार के अधिक अवसर प्रदान करने के लिए भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना, टंट्या मामा आर्थिक कल्याण एवं मुख्यमंत्री अनुसूचित जनजाति विशेष वित्तपोषण योजना की स्वीकृति प्रदान की है।
मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग भाजपा से नाराज था। 230 में से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। 2018 में कांग्रेस ने इनमें से 30 पर जीत दर्ज कर भाजपा को सत्ता से दूर किया था। इस वजह से भाजपा ने इस वर्ग के लिए खास योजना पर काम शुरू कर दिया है। सबसे बड़ी पहल की थी पिछले साल जब जनजातीय दिवस समारोह का आयोजन किया गया था। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आग्रह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे। तब से ही लगातार आदिवासी तबकों पर सरकार का फोकस है। केंद्र की राजनीति में राष्ट्रपति चुनावों में भी भाजपा ने यह साबित करने की कोशिश की कि वह आदिवासी वर्ग की सबसे बड़ी हितैषी है।
मध्यप्रदेश की सियासत में आदिवासी बेहद महत्वपूर्ण हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश की आबादी में करीब 22% वोट अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासियों का है। इस वर्ग के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। वहीं, करीब 80 सीटों पर आदिवासी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2003 में भाजपा ने आरक्षित 41 में से 37 सीटों पर कब्जा किया थआ। इसके बाद 2008 में आरक्षित सीटें बढ़कर 47 हो गई, तब भी भाजपा ने 29 सीटों और 2013 में 31 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2018 में कांग्रेस ने 30 और भाजपा ने सिर्फ 16 सीटें जीती थीं। इस वजह से सत्ता छिटककर कांग्रेस के पास आ गई थी।