कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति (सीईसी) द्वारा कांग्रेस की पहली सूची जारी किए जाने के बाद कांग्रेस नेताओं में चल रही रस्साकशी और तेज हो गई है।
चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया खासे नाराज हैं। कुछ टिकटों पर प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया से उनका टकराव तेज हो गया है।
बीच-बचाव करने वाले स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष मधुसूदन मिस्त्री के रवैये से भी सिंधिया जबर्दस्त नाराज बताए जा रहे हैं।
शनिवार रात उनकी बैठक मधुसूदन मिस्त्री और अन्य नेताओं के साथ होने की खबरें हैं।
सीईसी बैठक के बाद प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश ने प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया से भी बात की है। कई नामों का फैसला कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से ही हो पाएगा।
झगड़े की जड़
ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास समर्थक महेंद्र सिंह कालूखेड़ा अब तक मालवा की जावरा सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं। इस बार सिंधिया चाहते हैं कि कालूखेड़ा ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की सीट से चुनाव लड़ें।
साथ ही जावरा सीट पर भी अपने ही समर्थक को चुनाव लड़ाना चाहते हैं। जो महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के करीबी रिश्तेदार बताए जाते हैं।
कांतिलाल भूरिया इस मुद्दे पर विरोध कर रहे हैं और रतलाम जिले की सीटों पर अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं। भूरिया आदिवासी नेता होने के नाते आदिवासी सीटों पर भी अपनी दावेदारी कर रहे हैं।
भूरिया का गणित
दिग्विजय खेमे के कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने टिकट वितरण की प्रक्रिया में अपने गुट को ज्यादा टिकट दिलाने के पूरे प्रयास किए हैं।
पहली सूची के 115 नामों में से 30 नाम आदिवासी सीटों के हैं। इस खेमे की रणनीति यह है कि प्रचार अभियान के बागडोर भले ही ज्योतिरादित्य सिंधिया संभाले रहें, लेकिन कांग्रेस बहुमत हासिल कर लेती है तो विधायकों की राय से मुख्यमंत्री बनाने की मांग की जाए।
ऐसी स्थिति में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ नुकसान में रहेंगे।
सिंधिया का गणित
ज्योतिरादित्य सिंधिया का गणित यह है कि जब चुनाव प्रचार की बागडोर वह संभालेंगे तो स्वाभाविक रूप से कांग्रेस के बहुमत की दशा में उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए।
तब वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की मुंगावली सीट से महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के स्थान पर चुनाव लड़ सकते हैं। सिंधिया अभी स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख मधुसूदन मिस्त्री और भूरिया के रवैये से इतने नाराज हैं कि मध्य प्रदेश के चुनावी मामलों से हाथ खींचने तक विचार करने लगे हैं।
भूरिया समूह इसे उनकी दबाव बनाने की रणनीति मान रहा है। सिंधिया यदि चुनाव अभियान से पीछे हट जाते हैं तो प्रदेश में कांग्रेस की संभावनाओं को भारी झटका लगेगा।