1993 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए दिग्विजय सिंह और माधव राव सिंधिया का नाम शीर्ष पर था। लेकिन बाजी मारी दिग्विजिय सिंह ने। इससे पहले भी 1985-90 में राजीव गांधी भी अपने दोस्त माधव राव को मुख्यमंत्री के लिए अर्जुन सिंह और मोतीलाल वोरा पर तरजीह नहीं दे पाए थे।
वैसे मध्यप्रदेश की राजनीति में राघोगढ़ और सिंधिया घराने के बीच आपसी होड़ की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। इस होड़ की कहानी 200 साल से ज्यादा पुरानी है। जब 1816 में, सिंधिया घराने के दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा जयसिंह को युद्ध में हरा दिया था, राघोगढ़ को तब ग्वालियर राज के अधीन होना पड़ा था।
राहुल भी नहीं कर सके थे मदद
दिसंबर 2012 में राहुल गांधी अपने दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्यप्रदेश की कमान नहीं थमा पाए थे। ज्योतिरादित्य को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए कई वजहों से मजबूत माना जा रहा था। इसकी पहली बड़ी वजह तो यह थी कि वो सिंधिया राजघराने से हैं, जो भारतीय राजनीति में एक स्थापित घराना है। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी बतौर राजनेता स्थापित हैं।
सिंधिया यूपीए सरकार के दौरान मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में सात साल तक सूचना एवं प्रौद्योगिकी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के राज्यमंत्री थे। इसके बाद 2012 से 2014 तक वे बिजली मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री भी थे। हालांकि 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में उनको हार मिली थी।