मध्यप्रदेश में संपन्न चुनावों में लोगों ने बढ़-चढ़कर मतदान किया। इस बार हुई बंपर वोटिंग ने पिछले विधानसभा चुनाव का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया। बुलेट और बैलेट की जंग में बैलेट की जीत हुई और बालाघाट के नक्सल प्रभावी क्षेत्रों बैहर में 78.05%, लांजी में 79.07%, परसाड़ा में 80.05% मतदान हुआ। मतदान प्रतिशत में अमूमन ऐसी ही बढ़ोतरी ज्यादातर सीटों पर देखी गई। इस बढ़े मतदान प्रतिशत का फायदा किसे मिलेगा- भाजपा को या फिर कांग्रेस को?
इस बार 2.48% ज्यादा हुआ मतदान
2008 में 69.28 फीसदी वोटिंग हुए थी। 2013 विधानसभा चुनावों में इस वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई और यह
72.13% हो गई। 2.85 फीसदी अधिक मतदान होने से भाजपा की सीटों की संख्या 143 से बढ़कर 165 हो गई। यानी भाजपा को अधिक मतदान का फायदा हुआ और सीटों में 22 का इजाफा हुआ।
इस बार के मतदान ने पिछली बार का रिकॉर्ड तोड़ा है। मतदान प्रतिशत 74.61% बताया जा रहा है। मतदान के दौरान 1764 ईवीएम और 2126 वीवीपैट मशीनें बदलनी पड़ी मगर लोगों में उत्साह में कमी नहीं आई। 250 मतदान केंद्रों पर शाम 6 बजे के बाद भी वोटिंग जारी रही लिहाजा मतदान प्रतिशत में दो फीसदी तक का इजाफा और हो सकता है। 70% से ज्यादा वोटिंग अब तक राज्य में सिर्फ 2 बार 2013 और 2018 में हुई है।
मतदान प्रतिशत 4% से ज्यादा बढ़ने पर बदल जाती है सत्ता
पिछले 33 साल के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि जब कभी मतदान प्रतिशत 4% से ज्यादा बढ़ा है, सत्ताधारी पार्टी बदल गई है। 1990 में मतदान प्रतिशत में लगभग साढ़े चार फीसदी की बढ़ोतरी हुई तब प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस से सत्ता छीनी थी। तीन साल बाद हुए चुनाव में मतदान प्रतिशत करीब साढ़े 6 प्रतिशत बढ़ा तो एक बार फिर सत्ता परिवर्तन हुआ,सत्ता की चाभी कांग्रेस के हाथ आ गई। इसी तरह 2003 में 1998 के मुकाबले 7 प्रतिशत ज्यादा वोट गिरे। इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। उमा भारती ने दिग्विजय सरकार का तख्ता पलट किया था।
2008 और 2013 में मतदान प्रतिशत बढ़ा तो सही लेकिन सिर्फ दो फीसदी से ज्यादा। ऐसे में भाजपा सत्ता में बरकरार रही। तो इस बार 11 दिसंबर को देखना दिलचस्प होगा कि मतदान प्रतिशत में ये बदलाव किस ओर जाता है।