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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव : इस बार चुनावी लड़ाई में महाकौशल एंगिल की चर्चा

Wed, 21 Nov 2018 09:26 AM IST
राजेश चतुर्वेदी, भोपाल
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मध्यप्रदेश के महाकौशल में इस बार चुनावी लड़ाई की तस्वीर अलहदा है। वजह है, मुख्य प्रतिद्वंद्वियों भाजपा और कांग्रेस के सेनापति। दोनों इसी इलाके से आते हैं। माना जा रहा है कि इस बार सरकार चाहे जिसकी भी बने, महाकौशल का भविष्य सुनहरा है।

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38 विधानसभा सीटों का यह इलाका कांग्रेस का बड़ा गढ़ रहा है। एक वक्त था, जब सूबे में कांग्रेस की सियासत महाकौशल से ही संचालित होती थी। जबलपुर इसका केंद्र था। लेकिन बीते तीन दशकों में सूरत बदल गई है। पिछली बार 2013 के चुनाव में कांग्रेस को महज 13 सीटें मिली थीं, वहीं भाजपा को 24। एक पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था। 

उलटफेर करने को लड़ रही कांग्रेस

इस बार कांग्रेस उलटफेर करने के लिए लड़ रही है। कारण, कमलनाथ हैं। कांग्रेस में उनकी 40 साल की सियासत दांव पर लगी है। संयोग से इस वर्ष जब अप्रैल में जबलपुर के सांसद राकेश सिंह के पास भाजपा की जिम्मेदारी आई, तभी कांग्रेस ने भी छिंदवाड़ा के कमलनाथ के हाथ में कमान सौंप दी। 

लिहाजा चुनावी समर में महाकौशल का राजनीतिक महत्व बढ़ गया और अब जैसे-जैसे विधानसभा का चुनाव नजदीक आता जा रहा है, महाकौशल के इन दो चेहरों के राजनीतिक भविष्य पर भी चर्चाएं होने लगी हैं। छिंदवाड़ा में तो कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने की बात की जा रही है। 

बावजूद इसके कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे को पेश नहीं किया है, नारा लग रहा है- 'जन-जन ने ठाना है, कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाना है'। वैसे खुद कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने से कभी इनकार नहीं किया है। बल्कि यह उनकी पुरानी ख्वाहिश रही है।

भाजपा पर चौथी बार सरकार बनाने का दबाव

जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो उसके एजेंडे पर 'चौका' लगाना है यानी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लीडरशिप में लगातार चौथी बार सरकार बनाना। लेकिन पार्टी के चुनावी तंबुओं में चर्चा है कि यदि सरकार का चौका लगता है तो आठ माह में ही राकेश सिंह की छाती पर विजयी सेना के सेनापति का मेडल लगा दिया जाएगा। 

जबलपुर में तो कहा भी जाने लगा है- सरकार बनने के बाद शिवराज दिल्ली जाएंगे और राकेश की लाटरी खुल जाएगी। यों भी प्रदेश भाजपा में राकेश को अमित शाह का 'दूत' समझा जाता है।
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आंकड़ों में नहीं रहेगा बड़ा अंतर

उधर, रणभूमि के नजारे इस बार अलग हैं। आंकड़ों में बड़ा अंतर नहीं रहने वाला है। मुकाबला कांटे का है। कुछ स्थानों पर बागियों ने भाजपा का खेल बिगाड़ा रखा है। कांग्रेस बागियों को मनाने में कामयाब हुई है, पर भीतरघात का खतरा उसके साथ भी है। कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी का रोड शो हो चुका है। जबकि भाजपा 18 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा करवा चुकी है। अगले दौर में मोदी 25 नवंबर को जबलपुर में रहेंगे।

अवैध उत्खनन यहां का सबसे बड़ा मुद्दा है, जिसे कांग्रेस पिछले 15 साल से उछालती रही है। छिंदवाड़ा को छोड़ दें तो यह इलाका औद्योगिक विकास में भी पिछड़ा हुआ है। नरसिंहपुर में किसानों को गन्ने का दाम नहीं मिल रहा। कई शुगर मिलें ठप पड़ गई हैं। किसानों की आत्महत्या के मामले भी बढ़े हैं। किसानों की जमीनों का अधिग्रहण भी बड़ा मुद्दा है। एनटीपीसी और चुटका परमाणु बिजली घर के मुद्दे पर कई बार आंदोलन हो चुका है।

कुल मिलाकर दोनों ही पार्टियों ने महाकौशल पर फोकस किया है। भाजपा को विश्वास है कि शिवराज सरकार की संबल योजना, मोदी सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना और उज्ज्वला स्कीम का उसे लाभ होने वाला है, वहीं कांग्रेस 15 साल की एंटी इनकंबेंसी, नोटबंदी और जीएसटी से पैदा समस्याओं के सहारे भाग्य पलटने का इंतजार कर रही है।
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