भारत रत्न, स्वर कोकिला लता मंगेशकर का इंदौर आज सूना हो गया। अब न उनकी पसंदीदा मिर्च में वो तीखापन रहा न जलेबी में वो मिठास। दहीबड़े का स्वाद फीका है तो गुलाब जामुन बेस्वाद। सराफा उदास है औऱ चौपाटी मायूस। हर उस शख्स की आंखें नम हैं जिनके लिए लता महज एक नाम नहीं बल्कि एक एहसास है। एक गौरव है।
लता मंगेशकर के निधन के बाद यूं तो पूरे देशभर में शोक की लहर है लेकिन इसके बीच इंदौर में अजीब सा सूनापन हो गया। इसी शहर में जन्मीं लता जी को याद करके उनके प्रशंसक उदास हैं। वैसे तो लता जी का इंदौर आना कम होता था लेकिन उनके दिल से इंदौर कभी नहीं छूटा। जब भी किसी से बात होती तो इंदौर का जिक्र होने पर खुश हो जातीं। एक साक्षात्कार के दौरान जब लता जी से पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि इंदौर में मेरा जन्म हुआ है। मेरी मौसी के बच्चे वहां बड़े हुए हैं। मैं वहां रही हूं। इंदौर में अच्छा लगता था। वहां मुझे सराफा बहुत पसंद था जहां में दहीबड़े और अन्य चीज खाया करती थी। बहुत अच्छा लगता था। इंदौर कमाल की चीज है।
मैं इसलिए विलक्षण हूं क्योंकि मेरा जन्म इंदौर में हुआ
पिछले साल दिसंबर में लता मंगेशकर का टेलीफोनिक इंटरव्यू हुआ था। इसे राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय के कुलसचिव दिनेश कुमार पाठक ने लिया था। इसमें लता जी बेहद सरलता और सहजता से सवालों का जवाब दिया और इतने बड़े कद के बावजूद इतने धरातल पर बात की जो अनूठी है। जब लताजी से पूछा गया कि 1999 में पं. रविशंकर जी को भारत रत्न मिला और 2001 में आपको भारत रत्न दिया गया तो लता जी ने कहा कि पं. रविशंकर जी तो विश्व रत्न थे। मैं तो कुछ भी नहीं थी। ये सरकार की मेहरबानी है कि मुझे भारत रत्न बनाया। जब उनसे कहा कि आप विलक्षण हैं लता जी तो लता जी का जवाब था कि मैं विलक्षण इसीलिए हूं कि मेरा जन्म इंदौर में हुआ है। मैं अपने आप को मप्र की मानती हूं। मेरा और बहन का जन्म वहीं हुआ। मौसी वहीं रहती हैं। मैंने सुना है कि जहां मेरा जन्म हुआ वहां एक बोर्ड लगाया है। यह मप्र वालों की कृपा है। जब भी मैं मप्र आई तो बहुत प्यार और इज्जत मिली। खुद के नाम से मप्र सरकार द्वारा अलंकरण दिए जाने के सवाल पर लता जी ने पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का जिक्र भी किया और कहा कि मैं इंदौर को और मप्र को अपना ही समझती हूं। यदि मेरे नाम से मप्र सरकार दस रुपये का पुरस्कार भी देती है तो मेरे लिए बहुत बड़ी चीज है।