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मध्यप्रदेश का एक गांव जहां के बच्चे नहीं पहचानते अपने पिता को

Sun, 10 Jun 2018 08:08 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पन्ना
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मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में स्थित मनकी गांव को 'मिसिंग फादर्स' (गायब पिता) भी कहा जाता है। 513 लोगों की जनसंख्या वाले गांव के इस नाम के पीछे का कारण भी बहुत बड़ा है। गांव के हालात ऐसे हैं कि बच्चे अपने पिता से दूर रहने पर मजबूर हैं। चलिए आपको बतातें हैं इस नाम के पीछे की पूरी कहानी-
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70 फीसदी पुरुष गांव से बाहर

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सूखे से प्रभावित इस गांव के करीब 70 फीसदी पुरुष गांव से बाहर रहते हैं। वह अकसर दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में नौकरियों की तलाश में निकल जाते हैं। 
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खेती करना असंभव

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इस गांव में काफी समय से अच्छी बारिश नहीं हुई है, जिस कारण यह सूखे की चपेट में आ गया। यहां पानी की कमी होने से खेती करना भी असंभव है।    

महिलाएं भी छोड़ रहीं गांव

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अब तो महिलाएं भी गांव छोड़कर अपने पतियों के साथ काम की तलाश में शहरों की ओर प्रस्थान कर रही हैं। महिलाएं अपने पतियों के साथ ही निर्माण स्थलों पर काम करती हैं। घर का खर्चा चल सके इसके लिए वह गर्भवती अवस्था में भी काम करना नहीं छोड़तीं, वह 7वें और 8वें महीने में भी काम करती हैं। जब उनके प्रसव का समय आता है तभी वह गांव लौटती हैं। वहीं बच्चे जैसे ही थोड़े बड़े होते हैं तो उन्हें गांव में अन्य परिवारजनों के पास छोड़ दिया जाता है।
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पूर्ण सुविधा ना होने से खोए 4 बच्चे

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गांव की ही एक महिला सोमवती (32) हाल ही में अजमेर से गांव लौटी है। उसका कहना है कि वह भी अपने पति के साथ निर्माणाधीन स्थानों पर काम करती थी लेकिन वह गर्भवती है और उसका सातवां महीना चल रहा है जिस कारण वह गांव आई है। वह अपने 9वें बच्चे को जन्म देने वाली है। पूर्ण सुविधा ना होने के कारण वह आठ में से चार बच्चों को खो चुकी है।
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नहीं मिलती चिकित्सकीय सुविधा

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मनकी गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शकुंतला यादव यहां 10 साल से काम कर रही हैं। उनका कहना है, "गांव की महिलाएं अपने पतियों के साथ काम की तलाश में दूसरे शहर चली जाती हैं। वह गर्भावस्था में भी बिना उचित टीकाकरण और चिकित्सकीय देखभाल के काम करती हैं और प्रसव के समय जब वह गांव आती हैं तब तक उनकी स्थिति काफी नाजुक हो जाती है। जिसके बाद सामान्य डिलीवरी के अवसर कम हो जाते हैं।"
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गर्भवती स्त्रियों को करना पड़ता है काम

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यहां स्त्रियों को गर्भवती होते हुए भी काम करना पड़ता है। वह घर का खर्चा चलाने के लिए मीलों दूर जंगलों में लकड़ियां और तेंदु के पत्ते इकट्ठा करने जाती हैं। ऐसे में ये भी डर रहता है कि कहीं जंगली जानवर उन पर हमला ना कर दें। 

सुरक्षित प्रसव संभव नहीं

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यहां की महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। जिसका खामियाजा उन्हें और उनके होने वाले बच्चों को भुगतना पड़ता है। गांव में कोई दाई भी नहीं है और उन्हें किसी अस्पताल में भी नहीं ले जाया जा सकता। इसका पहला कारण है अस्पतालों का गांव से काफी दूर होना और दूसरा कारण है घर के पुरुषों का घर पर ना होनेा। इसलिए घर की महिलाओं को ही डिलीवरी करनी पड़ती है।   
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स्थानान्तरण ही आखिरी रास्ता

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राज्य में विस्थापन का आंकड़ा देखा जाए तो वह 2011 में 185,00,000 था। जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 50,00,000 रहा। इस गांव की महिलाओं का कहना है कि रोजी रोटी कमाने के लिए स्थानान्तरण ही एकमात्र रास्ता है। बच्चों का जन्म होते ही महिलाएं दोबारा शहरों की ओर लौट जाती हैं और निर्माण स्थलों पर काम करना शुरू कर देती हैं।
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