लगातार कटते जंगलों से दुनियाभर का वातावरण प्रभावित हो रहा है। वनों को बचाना वर्तमान दौर में सबसे बड़ी चुनौती है। देश के दिल मध्य प्रदेश की बात करें तो मध्य प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 30 फीसदी हिस्सा वनों से घिरा है, जो प्रदेश के क्षेत्रफल का लगभग 94689 वर्ग किमी है। मध्य प्रदेश देश के वन क्षेत्र में करीब 12.30 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। प्रदेश में वनों को बचाने में आदिवासी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। प्रदेश की लगभग 21 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय की है जो ज्यादातर वन क्षेत्रों के आसपास रहती है और अपनी आवश्यकताओं रोजी-रोजी के लिए इन्ही वनों पर आश्रित है। आइए विश्व पृथ्वी दिवस के मौके पर हम आपको प्रदेश की कुछ ऐसी ही ग्राम वन समितियों के बारे में बताते हैं जो कि वर्तमान में मध्य प्रदेश में वनों के संरक्षण और संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।
मध्य प्रदेश में वनों के संरक्षण, प्रबंधन और वनों की बहाली के लिए ग्राम वन समितियों के साथ जनभागीदारी से कार्य किया जा रहा है। इन वन समितियों की भागीदारी से वन क्षेत्रों को बहाल किया जा रहा है। इस मुहिम से वनों पर आश्रित समुदायों की आजीविका बढ़ने के साथ ही जीवन स्तर में भी सुधार हो रहा है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में वनों के कम होने से पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन व जलवायु संबंधी समस्याएं पैदा हो रही हैं। ऐसे में पर्यावरण संतुलन और समस्याओं को सुलझाने के लिए वनों की बहाली ही प्रभावी उपाय है। स्थानीय समुदायों को वनों के प्रबंधन और उनकी बहाली में शामिल करना जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक उचित और स्थायी तरीका है। इस दिशा में कार्य करते हुए मध्य प्रदेश वन विभाग के प्रयासों से वनों की बहाली की जा रही है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए गठित झाबुल जिले की बड़ी नाल्दी की ग्राम वन समिति ने आवंटित वन क्षेत्र को बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1995 में गठित इस समिति को 192 हेक्टेयर खाली वन क्षेत्र आवंटित किया गया था। बड़ी नाल्दी ग्राम वन समिति के सदस्यों और ग्रामीणों के प्रयासों से आवंटित वन क्षेत्र को बहाल कर वहां वनों को पुन: स्थापित किया गया है। वन विभाग और ग्राम वन समितियों के इन संयुक्त प्रयासों से निरंतर प्रदेश का वन क्षेत्र बढ़ रहा है, जिससे न सिर्फ जलवायु संतुलन में मदद मिल रही है बल्कि जनजाति समुदाय की वनोपज पर निर्भर आजीविका में भी बढ़ोत्तरी हुई है। मध्य प्रदेश वन विभाग की दृढ़ इच्छाशक्ति और वन ग्राम समिति के अथक प्रयासों से वनों के संरक्षण और विकास की दिशा में किये जा रहे कार्य प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय हैं।
जलवायु परिवर्तन के असर को सीमित करने और वन क्षेत्र में विकास के लिए मध्य प्रदेश वन विभाग माइक्रोप्लानिंग के माध्यम से कार्य कर रहा है। वनवासियों और स्थानीय समुदायों की जनभागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ग्राम वन समितियों को इससे जोड़कर इस दिशा में कार्य हो रहे हैं। स्थानीय समुदायों को नज़रअंदाज करके वनों की बहाली और विकास मुमकिन नहीं है, वनों की सुरक्षा के लिए बनाई गई योजनाओं में स्थानीय समुदायों की जनभागीदारी जरूरी है। वन जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभाव को कम करने में जंगल सबसे सहायक सिद्ध होते हैं। जंगल अपने आप में ही एक अलग संसार को समेटे होते हैं। धरती की अमूल्य जैव विविधता को बचाए रखने के लिए भी इन जंगलों को बचाए रखना जरूरी है। यही वजह है कि ग्राम वन समितियों के सहयोग से जंगलों की बहाली पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
प्रदेश के विभिन्न वन प्रभागों की ग्राम समितियों के प्रयासों से वन बहाली का मुश्किल कार्य संभव हो सका है। ऐसी ही एक ग्राम वन समिति है पश्चिमी मंडला वन प्रभाग की मनेरी ग्राम वन समिति। इस समिति का गठन 1996 में किया गया था। ग्राम वन समिति को 186.92 हेक्टेयर के प्रबंधन का कार्य सौंपा गया था। कम्पार्टमेंट संख्या 642 आरएफ अत्यधिक निम्नीकृत वन क्षेत्र है। यह वन क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र के आसपास होने के कारण गंभीर जैविक दबाव में था। बावजूद इसके स्थानीय समुदायों ने अवैध कटाई और चराई के खिलाफ वनों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्किंग के स्टॉक मैपिंग के अनुसार योजना (वर्ष 2004-14) क्षेत्र वनस्पति से रहित था और आरडीएफ कार्य करने के लिए आवंटित किया गया था।
साल 2003-04 और 2005-06 के बीच आरडीएफ योजना के तहत इस क्षेत्र की बहाली का काम शुरू हुआ। ग्राम वन समिति मनेरी का नेतृत्व कर रही एक महिला कल्लू बाई मार्को ने वन के संरक्षण और प्रबंधन के लिए समुदाय को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ग्राम वन समुदाय के अथक प्रयासों और दृढ़ संकल्प के चलते आज निर्धारित क्षेत्र वनों से बहाल हो गया है। इतना ही नहीं बीते दो सालों में समुदाय ने 3 हजार 526 सागौन और 31 ईंधन के ढेर की कटाई कर लाभ कमाया है।
जंगलों को बचाना धरती पर जीवन जारी रखने और धरती को बचाने के लिए बेहद जरूरी है। प्रदेश की आदिवासी आबादी की बड़ा हिस्सा वनों क्षेत्रों के आस-पास रहता है और इन्हें बचाने में अपनी सराहनीय भूमिका निभाते हुए लाभ अर्जित कर रहा है।