मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने डॉक्टर पति की हत्या के आरोप में दोषी ठहराई गई प्रोफेसर ममता पाठक की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की युगलपीठ ने कहा कि घटनास्थल पर कोई बाहरी व्यक्ति नहीं आया था, और परिस्थितिजन्य साक्ष्य यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि पत्नी ममता पाठक ने ही पहले पति को नशीली दवा देकर बेहोश किया, फिर करंट देकर उनकी हत्या कर दी।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा पर रोक को निरस्त करते हुए आरोपी को शेष कारावास भुगतने के लिए तत्काल संबंधित न्यायालय में समर्पण करने का निर्देश दिया है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे अब सुनाया गया।
डॉक्टर नीरज पाठक की रहस्यमयी मौत
रिश्तेदार को की गई कॉल बनी अहम सबूत
आरोपी का बचाव: धड़कन थी, इसलिए झांसी ले गई
ममता पाठक ने पुलिस को बताया कि जब उन्होंने डॉक्टर की नब्ज देखी तो उसमें हलचल थी। इसलिए अगले दिन वे ड्राइवर के साथ पति को डायलिसिस के लिए झांसी ले गईं, लेकिन कोविड प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण इलाज नहीं हो सका। रात 9 बजे वे वापस लौटीं और 1 मई को पुलिस को पति की मौत की सूचना दी।
कोर्ट में पेश की गई वैज्ञानिक दलीलें
केमिस्ट्री की प्रोफेसर ममता पाठक ने हाईकोर्ट में खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इलेक्ट्रिक व थर्मल बर्न के निशान तो बताए गए हैं, लेकिन उनकी तकनीकी जांच नहीं कराई गई। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि घर में MCB और RCCB जैसे विद्युत सुरक्षा उपकरण लगे थे, ऐसे में करंट लगने से मौत संभव नहीं थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि न तो एफएसएल टीम और न ही कोई विद्युत विशेषज्ञ घर की जांच के लिए भेजा गया। प्रारंभ में उन्होंने खुद कोर्ट में पक्ष रखा, बाद में वकीलों ने उनका प्रतिनिधित्व किया।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर न्याय
हाईकोर्ट ने 97 पृष्ठों के विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी तरह आपस में जुड़ी हुई है और यह साबित करती है कि हत्या ममता पाठक ने ही की। जिला न्यायालय ने भी इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर ममता पाठक को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी उचित ठहराया है।