जबलपुर हाईकोर्ट ने कांग्रेस आईटी सेल के तीन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को प्रथम दृष्टया अवैध हिरासत माना है। कोर्ट ने पीड़ितों के बयान पुलिस कमिश्नर भोपाल को भेजते हुए शिकायत मानकर कानूनी कार्रवाई करने और तीन माह में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
जबलपुर। भोपाल पुलिस के सहयोग से गिरफ्तार किए गए कांग्रेस आईटी सेल के तीन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट की जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने प्रथम दृष्टया अवैध हिरासत का मामला माना है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट जबलपुर द्वारा दर्ज किए गए पीड़ितों के बयानों की मूल प्रति पुलिस कमिश्नर भोपाल को भेजी जाए। पुलिस कमिश्नर इन बयानों को शिकायत मानकर कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करें।
गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के नाम से वायरल फर्जी पत्र मामले में राजस्थान पुलिस ने मध्यप्रदेश पुलिस के सहयोग से कांग्रेस आईटी सेल के तीन कार्यकर्ताओं को भोपाल से गिरफ्तार किया था। युवकों को कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखने के खिलाफ भोपाल निवासी खिजर खान सहित अन्य की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया था कि 20 अप्रैल 2026 की सुबह साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन भोपाल में पुलिस ने तीनों कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, लेकिन उन्हें दो दिनों तक किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया। बाद में उन्हें राजस्थान पुलिस को सौंप दिया गया।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से बताया गया कि राजस्थान पुलिस की मौखिक सूचना पर तीनों को पूछताछ के लिए बुलाया गया था और बाद में परिवार के सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद राजस्थान पुलिस ने दोबारा सूचना दी कि युवकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। अगले दिन उन्हें फिर साइबर सेल बुलाकर राजस्थान पुलिस को सौंप दिया गया।
पुलिस ने क्या कहा?
हालांकि, तीनों युवकों ने राजस्थान और मध्य प्रदेश पुलिस के दावों को गलत बताया। इसके बाद युगलपीठ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जबलपुर को निर्देश दिए कि किसी अधिकारी की नियुक्ति कर तीनों युवकों के अलग-अलग बयान दर्ज कराए जाएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मध्यप्रदेश पुलिस के संपर्क से लेकर जयपुर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने तक वास्तव में क्या हुआ।
कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?
सुनवाई के बाद युगलपीठ ने बयानों की एक प्रति रिकॉर्ड में रखने और मूल प्रति पुलिस कमिश्नर भोपाल को भेजने के निर्देश दिए। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बयानों के परीक्षण से प्रथम दृष्टया यह मामला अवैध हिरासत का प्रतीत होता है। पुलिस कमिश्नर भोपाल बयानों को शिकायत मानकर कानून के अनुसार कार्रवाई करें और तीन माह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करें। मामले की अगली सुनवाई 18 जून को निर्धारित की गई है।