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Jabalpur News: आपराधिक प्रकरण में आरोपी बनाए गए सब-रजिस्ट्रार को राहत, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बदला

Fri, 03 Apr 2026 08:01 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर

सार

हाईकोर्ट ने सब-रजिस्ट्रार को राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट का अतिरिक्त आरोपी बनाने का आदेश निरस्त किया। कोर्ट ने कहा कि नियमों के अनुसार दस्तावेज पंजीकरण करना उसकी बाध्यता थी और कोई लापरवाही नहीं थी। धारा 319 के तहत ट्रायल कोर्ट का आदेश दोषपूर्ण पाया गया, इसलिए निरस्त किया गया।

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आपराधिक प्रकरण में आरोपी बनाने गये सब-रजिस्ट्रार को मिली राहत
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विस्तार
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आपराधिक प्रकरण में आरोपी बनाए गए सब-रजिस्ट्रार को हाईकोर्ट से राहत मिली है। हाईकोर्ट जस्टिस बीपी शर्मा की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सब-रजिस्ट्रार को अतिरिक्त अभियुक्त बनाए जाने के आदेश को निरस्त कर दिया है। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता सब-रजिस्ट्रार होने के नाते दस्तावेज को पंजीकृत करने से मना भी नहीं कर सकता था। पंजीकरण के लिए आवश्यक सभी दस्तावेज आरोपियों द्वारा प्रस्तुत किए गए थे।

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याचिकाकर्ता आनंद कुमार पांडे की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि आरोपी संजीव श्रीवास्तव तथा यूसुफ अली राजा ने 20 मार्च 2018 को एक लीज डीड के जरिए एक ऐसे प्लॉट को बेच दिया, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। लीज डीड का पंजीयन इटारसी स्थित सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में सब-रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत याचिकाकर्ता द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए किया गया था। ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 319 का प्रयोग करते हुए 10 जनवरी 2025 को पारित अपने आदेश में याचिकाकर्ता को प्रकरण में अतिरिक्त आरोपी बनाते हुए समन जारी कर दिए गए थे। ट्रायल कोर्ट में अपने आदेश में कहा था कि विचाराधीन पट्टा विलेख में कथित तौर पर कुछ त्रुटियां थीं। सब-रजिस्ट्रार को उक्त दस्तावेज का पंजीकरण करने से पूर्व, उसमें सुधार हेतु उसे वापस लौटा देना चाहिए था।

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याचिका में कहा गया था कि पट्टा विलेख का पंजीकरण याचिकाकर्ता द्वारा अपने शासकीय कार्यों के सामान्य क्रम में ही किया गया था। सब-रजिस्ट्रार होने के नाते, वह दस्तावेज को पंजीकृत करने से मना भी नहीं कर सकता था। दस्तावेज के निष्पादक का आदेश नगर परिषद के सीएमओ द्वारा जारी आदेश के साथ एआरई ने उनके समक्ष प्रस्तुत किया था। जो पहले भी उसी योजना के तहत अन्य भूखंड धारकों के पट्टा विलेखों के निष्पादन और पंजीकरण के लिए उपस्थित होते रहे थे। दस्तावेज कानून के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है, तो सब-रजिस्ट्रार उसे पंजीकृत करने के लिए बाध्य होता है। पंजीकरण अस्वीकार करने का कोई अवसर ही नहीं था।

कोई लापरवाही नहीं
याचिका में कहा गया था कि नर्मदापुरम जिले के वरिष्ठ जिला रजिस्ट्रार द्वारा कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को पत्र के माध्यम से इस बात की पुष्टि की गई है कि उक्त दस्तावेज का पंजीकरण नियमों और विनियमों का पालन करते हुए ही किया गया था। याचिकाकर्ता की तरफ से किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं की गई है। पंजीकरण के पूर्व प्रीमियम राशि का भुगतान भी कर दिया गया था।

कोर्ट ने दिया ये आदेश
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अभिलेख के अवलोकन से यह परिलक्षित होता है कि नक्शे की एक सही कॉपी लीज डीड के साथ अपलोड की गई थी। याचिकाकर्ता उस लीज डीड को रजिस्टर करने से मना नहीं कर सकता था, और इस तरह याचिकाकर्ता द्वारा कर्तव्यों की उपेक्षा का कोई सवाल ही नहीं उठता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए एकलपीठ ने कहा है कि असली कसौटी यह है कि क्या शिकायत किए गए काम को न करने पर सरकारी कर्मचारी पर ड्यूटी में लापरवाही का आरोप लग सकता था। इस सवाल का जवाब हां में है, तो उस काम को निश्चित रूप से सरकारी ड्यूटी के दौरान किया गया काम ही माना जाना चाहिए।
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ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 319 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करने का मूल आधार ही शुरू से ही दोषपूर्ण थी और विवादित आदेश कानून की नजर में पूरी तरह से टिकने लायक नहीं है। धारा 319 के तहत जरूरी संतुष्टि को पूरी सावधानी के साथ रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और स्पष्ट कारणों द्वारा समर्थित होना चाहिए। इससे यह साबित हो सके कि सबूत जरूरी मापदंडों को कैसे पूरा करते हैं। विवादित आदेश अपने मौजूदा स्वरूप में, इस शर्त को पूरा नहीं करता है।

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