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MP News: मृत विवाह अपने आपमें मानसिक क्रूरता, हाईकोर्ट ने कहा पति है तलाक का हकदार

Mon, 15 Jan 2024 07:02 PM IST
दिनेश शर्मा अमर उजाला, न्यूज डेस्क, जबलपुर

सार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में मृत विवाह को एक प्रकार का मानसिक क्रूरता माना और पति को तलाक का हकदार बताया है। निचली अदालत से तलाक का मामला खारिज होने के बाद हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी। जिस पर कोर्ट ने ये आदेश दिया। 
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि मृत विवाह अपने आप में मानसिक क्रूरता है। नोटिस तामिल होने के बावजूद भी अनावेदिका की तरफ से कोई जवाब पेश नहीं किया गया। यह आचरण स्वयं संकेत देता है कि अनावेदिका को साथ रहने में कोई रुचि नहीं है। हाईकोर्ट जस्टिस शील नागू तथा जस्टिस विवेक सराफ की युगलपीठ ने शादी के बाद से पत्नी द्वारा सहवास नहीं करने के एकतरफा निर्णय को मानसिक क्रूरता मानते हुए तलाक प्रदान करने के आदेश जारी किए हैं।
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याचिकाकर्ता सुदीप्तो शाह की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि उसका विवाह 12 जुलाई 2006 को हिंदू रीति रिवाज के अनुसार पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में हुआ था। विवाह के बाद पत्नी ने सहवास नहीं करने का एकतरफा निर्णय ले लिया। पत्नी ने बताया कि वह किसी अन्य व्यक्ति से प्यार करती है और परिजनों के दबाव में उसके साथ विवाह किया है। वह 23 जुलाई 2006 को पत्नी के लेकर अपने घर भोपाल आया था। इसके बाद 28 जुलाई 2006 को यूएसए चला गया था। पत्नी के एकतरफा निर्णय के कारण दोनों के बीच अभी तक शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हुए हैं। इसलिए विवाह पूर्ण रूप से संपन्न नहीं हुआ है।

याचिका में कहा गया था कि यूएसए जाने के बाद पत्नी ने उसे ई-मेल में माध्यम से आत्महत्या करने की धमकी दी थी। इसके बाद सितंबर 2006 में अपने मायके चली गई थी। पत्नी ने साल 2013 में पश्चिम बंगाल में उसके तथा माता-पिता के खिलाफ दहेज एक्ट सहित अन्य धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज करवाया था। इसके कारण उसके माता-पिता को 23 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। इसके बाद दोनों पक्षों में आपसी समझौते के तहत तलाक हुआ था और उसके स्त्रीधन के साथ भरण-पोषण के लिए दस लाख रुपये प्रदान किए थे।
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याचिकाकर्ता ने भोपाल कुटुम्ब न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन दायर किया था। कुटुम्ब न्यायालय ने नवंबर 2014 में उसके आवेदन को खारिज कर दिया था। इसके कारण उक्त अपील दायर की गई। अपील की सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने पाया कि अनावेदक महिला द्वारा जिला न्यायालय में भी उसकी तरफ से लिखित जवाब पेश किया गया है। वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुई थी। हाईकोर्ट द्वारा जारी नोटिस का भी उसकी तरफ से कोई जवाब पेश नहीं किया गया। आवेदक की तरफ से दो अखबार में भी नोटिस का प्रकाशन किया गया।

युगलपीठ ने पाया कि अनावेदिका द्वारा दर्ज कराया गया प्रकरण लंबित है। इसके अलावा याचिकाकर्ता यूएसए चला गया था और अनावेदिका को ले जाने के लिए उसने कोई प्रयास नहीं किए। इस आधार पर तलाक की डिग्री जारी नहीं करने का निर्णय उचित है। याचिकाकर्ता ने हलफनामे में आरोप लगाया है कि शादी के बाद से पत्नी ने सहवास नहीं करने का एकतरफा निर्णय लिया था। जिसका खंडन करने के लिए आवेदन उपस्थित नहीं है। नोटिस का जवाब नहीं देने से स्पष्ट है कि वह पति के साथ रहना नहीं चाहती है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि दोनों के बीच साल 2006 से कोई संपर्क नहीं है। मृत विवाह अपने आप में मानसिक क्रूरता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि संभोग करने से इंकार करने का एकतरफा निर्णय मानसिक क्रूरता है। इस आधार पर याचिकाकर्ता तलाक की डिग्री पाने का हकदार है। युगलपीठ ने आदेश की प्रति कुटुम्ब न्यायालय को भेजने के निर्देश जारी किए हैं। 
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