जबलपुर हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए बालाघाट निवासी अपीलकर्ता को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक अकादमी से नियमित प्रशिक्षण के बावजूद वे अपने कर्तव्यों का सही पालन नहीं कर पा रही हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले में आजीवन कारावास की सजा को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को दोषमुक्त कर दिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान निचली अदालतों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह आश्चर्यजनक है कि राज्य न्यायिक अकादमी में नियमित प्रशिक्षण के बावजूद निचली अदालतें न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन में बार-बार विफल हो रही हैं।”
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मामला बालाघाट निवासी देउल खरोले से जुड़ा है, जिसे निचली अदालत ने पॉक्सो, अपहरण समेत अन्य धाराओं में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर कहा कि पीड़िता उसके साथ स्वेच्छा से गई थी और दोनों ने शादी कर पति-पत्नी के रूप में जीवनयापन किया। पुलिस ने परिजनों के दबाव में जबरन आरोप दर्ज कराए।
सुनवाई में अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दोनों के बीच सहमति से संबंध बने थे, मेडिकल रिपोर्ट में भी किसी तरह की चोट या जबरदस्ती के निशान नहीं पाए गए। वहीं, उम्र निर्धारण को लेकर विवाद सामने आया। स्कूल के दस्तावेजों में पीड़िता को नाबालिग दर्शाया गया था, जबकि एक्स-रे रिपोर्ट में उसकी उम्र 17 वर्ष बताई गई। कोर्ट ने मेडिकल ज्यूरीस्प्रूडेंस एंड टॉक्सिकोलॉजी की पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि उम्र निर्धारण में दो वर्ष तक की त्रुटि संभव है।
हाईकोर्ट ने पाया कि स्कूल में दर्ज जन्मतिथि के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है और घटना के एक माह बाद कराई गई एक्स-रे रिपोर्ट में पीड़िता को बालिग माना गया। इसी आधार पर युगलपीठ ने आरोपी की सजा निरस्त कर दी और उसे दोषमुक्त करार दि