हाईकोर्ट ने जमानत शर्तों के उल्लंघन के आधार पर जिला न्यायालय द्वारा एक आरोपी की जमानत रद्द किए जाने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि जमानत रद्द करने की प्रक्रिया सावधानीपूर्वक होनी चाहिए, लेकिन यदि आरोपी शर्तों का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय को उसे रद्द करने का अधिकार है।
रीवा जिले के ग्राम टिकुरी के सरपंच महेश साकेत ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि राजनीतिक दुश्मनी के चलते उनके खिलाफ झूठे आपराधिक मामले दर्ज कराए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में उन्हें एक मामले में जमानत मिली थी, लेकिन इसे रद्द कराने के लिए उनके खिलाफ नई आपराधिक शिकायतें दर्ज कराई गईं। महेश साकेत के अनुसार, अनावेदक महेंद्र सिंह का उनके पहले दर्ज मामले से कोई संबंध नहीं था, लेकिन जमानत मिलने के बाद उसने गढ़ थाना में साजिश के तहत उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया। इसके अलावा, गढ़ थाना के एसएचओ विकास कपीस ने भी उनके खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज कर उन्हें सरपंच पद से हटाने के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखा। इसके बाद, अनावेदक ने जिला न्यायालय में पूर्व में मिली जमानत रद्द करने का आवेदन दिया, जिसे 17 जनवरी को स्वीकार कर लिया गया।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट के जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान पाया कि जमानत मिलने के बाद आवेदक के खिलाफ दो नए आपराधिक मामले दर्ज हुए, जो जमानत शर्तों का उल्लंघन है। इस आधार पर, अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जिला न्यायालय के आदेश में कोई गलती नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने की शक्ति का उपयोग न्यायालय को बहुत सोच-समझकर करना चाहिए, लेकिन यदि आरोपी जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो इसे रद्द किया जा सकता है। इस फैसले के साथ, हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा और याचिका को खारिज कर दिया।