संदेह-अनुमान के आधार नहीं कर सकते हत्या के अपराध में दंडित
सड़क दुर्घटना में व्यक्ति की मृत्यु होने पर हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा से दंडित किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक कुमार सिंह तथा जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की युगलपीठ ने अपील की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में कहा है कि संदेह-अनुमान किसी भी स्थिति में सबूत का स्थान नहीं ले सकते। हत्या के अपराध में संभावना के आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता है। युगलपीठ ने मामले को इरादतन हत्या का मानते हुए सजा में कटौती की।
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भोपाल निवासी लखन महाराज तथा सुरेश शर्मा की तरफ से साल 1997 में उक्त अपील दायर की गई थी। अपील में कहा गया था अपीलकर्ता लखन महाराज रांग साइड में ट्रक चला रहा था। ट्रक में उसके साथ अपीलकर्ता सुरेश शर्मा तथा सह अभियुक्त चंदन सवार थे। बरखेड़ी टोला के समीप लखन महाराज ने स्कूटर सवार सरवर अली खान को टक्कर मार दी थी। इस घटना में उसकी मृत्यु हो गई थी। पुलिस ने तीनों खिलाफ हत्या का प्रकरण दर्ज कर न्यायालय में प्रकरण प्रस्तुत किया था। न्यायालय ने साजिश की धारा 120 बी के तहत उन्हें दोषमुक्त कर दिया था परंतु धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया गया था।
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याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि उसने हादसा टालने का प्रयास किया था। ट्रक के टायर के 30 फीट लंबे स्किड मार्क उपस्थित थे। न्यायालय ने इसे पूर्व-नियोजित षड्यंत्र नहीं मानते हुए धारा 120 बी के तहत दोषमुक्त कर दिया है। जिससे स्पष्ट है कि उनका पूर्व नियोजित तरीके से वारदात को अंजाम नहीं दिया है, यह सिर्फ एक हादसा था। सरकार की तरफ से बताया गया कि पूर्व में अपीलकर्ता लखन महाराज ने सरवर अली खान पर आपसी रंजिश के कारण जानलेवा हमला किया था। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि धारा 120 बी के तहत दोषमुक्त किए जाने से स्पष्ट है कि वास्तव में कोई आपराधिक षड्यंत्र था। युगलपीठ ने गैर इरादतन हत्या का मामला मानते हुए अपीलकर्ता के द्वारा काटी गई सजा एक साल 7 माह तथा 3 माह 5 दिनों को पर्याप्त मानते हुए दो रिहा करने के आदेश जारी किए हैं।