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Jabalpur: यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे की राख में रेडियोएक्टिव तत्व, मुख्य याचिका के साथ सुनवाई के निर्देश

Mon, 28 Jul 2025 11:02 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर

सार

Jabalpur News: याचिका में दावा किया गया कि उक्त कचरे में रेडियोएक्टिव पदार्थ शामिल थे, जिनमें नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया लंबे समय से जारी थी। ऐसे में विनष्टीकरण के बाद भी राख में ये जहरीले तत्व शेष हैं, जो न केवल मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित करेंगे बल्कि इसका प्रभाव पूरे मानव समुदाय और पर्यावरण पर पड़ेगा।
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जबलपुर हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के जहरीले कचरे की राख में रेडियोएक्टिव तत्वों की मौजूदगी के आरोपों के बीच जबलपुर हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश जारी किया है। लैंडफिल सेल के जरिए जहरीली राख के निस्तारण की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने निर्देश दिए हैं कि इस याचिका को मुख्य याचिका के साथ जोड़ा जाए और विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई की जाए।

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याचिकाकर्ताओं ने उठाया गंभीर पर्यावरणीय संकट का मुद्दा
यह जनहित याचिका भोपाल निवासी अधिवक्ता बी.एल. नागर और समाजसेवी साधना कर्णिक प्रधान द्वारा दाखिल की गई थी। याचिका में कहा गया था कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में जमा 337 मीट्रिक टन जहरीले कचरे का विनिष्टीकरण पीथमपुर स्थित सुविधा केंद्र में किया जा चुका है। इस प्रक्रिया के पश्चात 850 मीट्रिक टन जहरीली राख और अवशेष शेष बचे हैं, जिन्हें अब लैंडफिल सेल में दफनाने की तैयारी की जा रही है।

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याचिका में दावा किया गया कि उक्त कचरे में रेडियोएक्टिव पदार्थ शामिल थे, जिनमें नाभिकीय विखंडन (nuclear fission) की प्रक्रिया लंबे समय से जारी थी। ऐसे में विनष्टीकरण के बाद भी राख में ये जहरीले तत्व शेष हैं, जो न केवल मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित करेंगे बल्कि इसका प्रभाव पूरे मानव समुदाय और पर्यावरण पर पड़ेगा।
 
मरकरी की उपस्थिति और निस्तारण तकनीक पर उठाए सवाल
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि राख में बड़ी मात्रा में मरकरी (पारा) मौजूद है, जिसे नष्ट करने की उन्नत तकनीक केवल जापान और जर्मनी जैसे देशों के पास ही उपलब्ध है। भारत में फिलहाल इस स्तर की कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया या उपकरण मौजूद नहीं है जिससे इस तत्व को पूर्णतः निष्क्रिय किया जा सके।
 
विशेषज्ञों की राय लेने की मांग
जनहित याचिका में यह भी कहा गया कि सरकारी और निजी विशेषज्ञों की राय इस निस्तारण प्रक्रिया को लेकर आपस में भिन्न है। ऐसे में यह आवश्यक है कि विशेषज्ञों की समवेत राय के आधार पर ही राख के निपटान की प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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हाईकोर्ट ने याचिका को दी प्राथमिकता
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋत्विक दीक्षित ने कोर्ट में पक्ष रखते हुए आग्रह किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है। इसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को पहले से लंबित मुख्य याचिका के साथ संलग्न करते हुए विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
 
40 वर्षों से चला आ रहा है कचरे का संकट
गौरतलब है कि 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद से यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में यह जहरीला कचरा पड़ा हुआ था, जो चार दशकों तक विभिन्न वैज्ञानिक और प्रशासनिक विवादों के चलते यथास्थिति में रहा। हाल ही में इसके विनिष्टीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन अब इस पर भी नए सवाल खड़े हो गए हैं।

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