महिला एव बाल विकास विभाग के आयुक्त को हाईकोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के लिए कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कहा है कि अगली सुनवाई पर आयुक्त व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित नहीं होते हैं तो उनके खिलाफ जमानतीय वारंट जारी किया जाएगा।
बता दें कि याचिकाकर्ता फूलवर्ती नामदेव, देवरानी सेन व सावित्री सोलंकी की तरफ से याचिका दायर की गई थी। इसमें कहा गया था कि वह महिला एव बाल विकास विभाग में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत थीं। साल 1998 को उससे कनिष्ठ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सुपरवाइजर के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने साल 2010 में उनके पक्ष में आदेश पारित किया था। जिसके खिलाफ सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची थी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनके पक्ष में आदेश पारित किया था।
सरकार द्वारा आदेश का परिपालन नहीं किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका लगाई गई थी। जिसकी सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से बताया गया था कि उन्हें साल 1998 से सुपरवाइजर के पद पर पदोन्नत कर दिया गया है। दायर याचिका में कहा गया था कि उन्हें पदोन्नत तो कर दिया गया परंतु नो वर्क- नो पेमेंट के आधार पर वेतन सहित अन्य लाभ का भुगतान नहीं किया गया।
नहीं माना गया कोर्ट का आदेश
पूर्व में न्यायालय ने आदेश जारी किए थे कि वेतन संबंधित अन्य लाभ के संबंध में सरकार 6 सप्ताह में याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर निर्णय ले। पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से बताया गया कि अभ्यावेदन प्रस्तुत किए सवा साल से अधिक का समय हो गया है, परंतु हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद भी उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। हाईकोर्ट ने सरकार अंतिम अवसर प्रदान करते हुए अभ्यावेदन के निराकरण के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। एकलपीठ ने चेतावनी दी थी कि निर्धारित समय में अभ्यावेदन का निराकरण नहीं किया जाता तो आयुक्त महिला एव बाल विकास को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहें। याचिका की सुनवाई के दौरान एकलपीठ ने बताया गया कि अंतिम अवसर देने के बावजूद भी निर्धारित समय में अभ्यावेदन का निराकरण नहीं किया गया है। आयुक्त भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुई हैं और अनुपस्थिति के लिए आवेदन पेश किया है। जिसे गंभीरता से लेते हुए युगलपीठ ने उक्त आदेश जारी किए। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता कांषी राम पटैल ने पैरवी की।