मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में सिर्फ कागजों में नर्सिंग कॉलेज संचालित होने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश नर्सिंग रजिस्ट्रेशन काउसिंल की तरफ से जवाब पेश करने के लिए समय प्रदान करने का आग्रह किया गया। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रवि विजय कुमार मलिमठ तथा जस्टिस पी के कौरव की युगलपीठ ने पूर्व में समय दिए जाने के बावजूद भी जवाब पेश नहीं करने पर जमकर फटकार लगाई। युगलपीठ ने जवाब पेश करने के लिए एक सप्ताह का समय प्रदान करने हुए अगली सुनवाई 19 अप्रैल को निर्धारित की है।
लॉ स्टूडेंट्स एसोशिएशन के अध्यक्ष विशाल बघेल की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि शैक्षणिक सत्र 2000-21 में प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में 55 नर्सिंग कॉलेज को मान्यता दी गई थी। मप्र नर्सिंग रजिस्ट्रेशन कौंसिल ने निरीक्षण के बाद इन कॉलजों की मान्यता दी थी। वास्तविकता में ये कॉलेज सिर्फ कागज में संचालित हो रहे हैं। ऐसा कोई कॉलेज नहीं है जो निर्धारित मापदंड पूरा करता है। अधिकांश कॉलेज की निर्धारित स्थल में बिल्डिंग तक नहीं है। कुछ कॉलेज सिर्फ चार-पांच कमरों में संचालित हो रहे हैं। ऐसे कॉलेज में प्रयोगशाला सहित अन्य आवश्यक संरचना नहीं है। बिना छात्रावास ही कॉलेज का संचालन किया जा रहा है। नर्सिंग कॉलेज को फर्जी तरीके से मान्यता दिए जाने के आरोप में मप्र नर्सिंग रजिस्ट्रेशन कौंसिल के रजिस्टार को पद से हटा दिया गया था। फर्जी नर्सिंग कॉलेज संचालित होने के संबंध में उन्होंने शिकायत की थी। शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण उक्त याचिका दायर की गई है।
याचिका के साथ ऐसे कॉलेज की सूची पर फोटो प्रस्तुत किए गए थे। याचिका में कहा गया था कि जब कॉलेज ही नहीं है तो छात्रों को कैसे पढ़ाया जाता होगा। याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने ऐसे कॉलेजों को अनावेदक बनाने याचिकाकर्ता को निर्देश दिए थे। पिछली सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने अनावेदक बनाए गए सात नर्सिंग कॉलेजों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता आलोक वागरेजा ने पैरवी की।