कालाबाजारी और आवश्यक वस्तु की आपूर्ति एव देखभाल अधिनियम के तहत जेल में नजरबंद किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस शील नागू तथा जस्टिस एमएस भट्टी की युगलपीठ ने बताया कि जिला मजिस्ट्रेट ने आदेश के संबंध में सरकार को पांच दिन बाद सूचित किया था। देर के लिए पर्याप्त कारण नहीं होने पर युगलपीठ ने उक्त आदेश को निरस्त कर दिया है।
सागर निवासी आशीष दुबे की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि उसके भाई नीरज दुबे के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट ने 20 जनवरी को कालाबाजारी की रोकथाम व आवश्यक वस्तु की आपूर्ति का रखरखाव अधिनियम, 1980 के तहत जेल में नरजबंद किए जाने के संबंध में जारी किए थे। जिला मजिस्ट्रेट ने एसडीओ द्वारा भेजे गए प्रतिवेदन के आधार पर उक्त आदेश जारी किए थे।
याचिका में कहा गया था कि एसडीओ ने 7 जनवरी ने खाद्य विभाग की रिपोर्ट के आधार पर नोटिस जारी किए थे। नोटिस में उल्लेखित तिथि 12 जनवरी को एसडीओ के समक्ष उपस्थित हुआ था। जिसके बाद सुनवाई 18 जनवरी को निर्धारित की गई थी। उक्त सुनवाई के दौरान उसके भाई ने विभागीय रिपोर्ट देने का आग्रह किया था। एसडीओ ने उसके आवेदन पर कोई आदेश जारी नहीं करते हुए 26 लाख रुपये की रिकवरी के आदेश जारी कर दिए। इसके अलावा कालाबाजारी की रोकथाम व आवश्यक वस्तु की आपूर्ति का रखरखाव अधिनियम, 1980 के तहत कार्रवाई के लिए जिला मजिस्ट्रेट को प्रतिवेदन भेज दिया।
जिला मजिस्ट्रेट ने 20 जनवरी को उक्त आदेश जारी कर दिए। जिसके बाद पुलिस ने उसके भाई को गिरफ्तार कर लिया और वह जेल में निरुध्द है। याचिका में कहा गया था कि सुनवाई का अवसर दिए बिना ही उसके भाई के खिलाफ कार्रवाई की गई है। जिस राशन दुकान में गड़बड़ी पाई गई थी उसका भाई उसमें बिक्री प्रभारी था। खाद्य विभाग ने जब राशन दुकान में दबिश दी थी उसका भाई वहां मौजूद तक नहीं था। याचिका में गृह विभाग के प्रमुख सचिव, डीजी जेल, जिला मजिस्ट्रेट व पुलिस अधीक्षक सागर सहित अन्य को अनावेदक बनाया गया था।
युगलपीठ ने जिला मजिस्ट्रेट के हलफनामा सहित रिकॉर्ड पेश करने के आदेश जारी किए थे। पेश किए गए हलफनामा में पाया गया कि आदेश के संबंध में जिला मजिस्ट्रेट ने 25 जनवरी सरकार को सूचित किया था। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि आदेश के संबंध में सरकार को तुरंत सूचित करना था। उच्च न्यायालय ने तुरंत की व्याख्या करते हुए अपने आदेश में कहा है कि बिना किसी कारण से देरी हुई है। विलंब के लिए जिला मजिस्ट्रेट बाध्य है और उसे उचित कारण बताना आवश्यक है। बिना किसी उचित कारण सूचना में विलंब के आधार पर युगलपीठ ने नजरबंदी के आदेश को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता काशी पटैल ने पैरवी की।