मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिलता है तो वह कांतिलाल भूरिया के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री के दावे को अनदेखा नहीं कर पाएगी।
प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ, सुरेश पचौरी और अजयसिंह के तमाम दावेदारियों के बाद भी कांतिलाल भूरिया की दावेदारी बरकरार है।
मध्य प्रदेश में आदिवासियों की संख्या करीब 20 फीसदी है। पिछले दो चुनावों से आदिवासी मतदाताओं ने बड़ी तादाद में भाजपा को वोट दिए हैं, लेकिन इस बार कांग्रेस का अनुमान है कि आदिवासी मतदाता उनके साथ आ रहा है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया का कहना है, ‘जब कांग्रेस नेतृत्व ने मुझे प्रदेशाध्यक्ष बनाया तो आदिवासियों में सकारात्मक संकेत गया। उन्हें लगा कि पार्टी एक आदिवासी को नेतृत्व सौंप सकती है।’
भूरिया मध्य प्रदेश में आदिवासियों का अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। उनके अनुसार, ‘मैं जहां भी गया, आदिवासी जंगलों से निकल-निकलकर बड़ी संख्या में बाहर आते थे। आष्टा, बागली जैसी सीटों पर 15,000-20,000 आदिवासी सभाओं में आए। उनका रुझान कांग्रेस की ओर बढ़ा है।’
कांग्रेस के बहुमत हासिल करने की स्थिति में यदि आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा जाता है तो कोई भी उसका विरोध नहीं कर पाएगा।
दिग्विजय का समर्थन
कांतिलाल भूरिया के साथ सबसे बड़ा पहलू यह है कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का समर्थन उन्हें प्राप्त है। भूरिया कहते हैं, ‘हम केवल आदिवासियों की राजनीति नहीं कर रहे हैं, हमने सभी समाजों, वर्गों को साथ लिया। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जी और सभी प्रमुख नेताओं ने घूम-घूमकर जनता को जगाया।’
हालांकि भूरिया मुख्यमंत्री पद पर अपने दावेदारी को लेकर खुलकर बोलने से बचते हैं। उनके अनुसार, ‘कांग्रेस करीब 140 सीटें जीतने वाली है। तब हाईकमान निर्णय करेगा कि किसे मुख्यमंत्री बनाना है।’
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सभाओं में आदिवासियों को खुलकर जिक्र किया। उनके विकास करने के कई वादे भी किए। क्या राहुल गांधी किसी आदिवासी के पक्ष में ही राय देंगे, जब मुख्यमंत्री बनाने का मौका आएगा?
भूरिया का कहना है, ‘यह फैसला आलाकमान करेगा। मैं कुछ नहीं कहना चाहता।’
भूरिया के गृहजिले झाबुआ में उनकी भतीजी कलावती भूरिया ने ही बगावत कर दी है। भूरिया भी ऐसी कोई पुष्टि नहीं करते कि आदिवासी इलाकों में कांग्रेस कितनी सीटें जीत पाएगी।
कांतिलाल भूरिया के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाएगा कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को आदिवासी मतदाताओं को सकारात्मक संकेत देने के लिए भूरिया को नेतृत्व सौंपना चाहिए।
बाकी बड़े दावेदार
ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार अभियान के प्रमुख बनाए गए थे। उनके इलाके ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस को 23 सीटे हासिल होने की उम्मीद है। पिछली बार कांग्रेस को इस इलाके की 34 में से 12 सीटें मिली थीं। कांग्रेस अपनी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन कर पाती है तो सिंधिया दावेदार होंगे। उन्होंने विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा है।
सुरेश पचौरी ने विधानासभा का चुनाव भोजपुर से लड़ा है। वे मुख्यमंत्री पद की कोई दावेदारी नहीं कर रहे, लेकिन उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनके पास कितने विधायक होंगे यह देखना है।
कमलनाथ को एक समय संभावित मुख्यमंत्री आंका जा रहा था और उन्होंने इनकार भी नहीं किया था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में महाकौशल में वे कितने लोगों को जिता पाते हैं।
अजयसिंह को अभी चुरहट सीट पर ही जीतना संघर्षपूर्ण माना जा रहा है। रीवा-सीधी-सतना में वे कितने समर्थकों को जिता पाते हैं, इस प्रश्न का उत्तर 8 दिसंबर को ही मिलेगा।
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