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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: मेहनत के मामले में पुरुषों से आगे अगरिया समाज की महिलाएं, 65 वर्षीय पश्चिमा बाई बनी मिसाल

Tue, 08 Mar 2022 11:17 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अशोकनगर

सार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मिलिए मध्य प्रदेश की अगरिया जनजाति की महिलाओं से, जो कि मेहनत के मामले में पुरुषों से भी आगे हैं और घर चलाने के लिए लोहे का घन चलाने से भी पीछे नहीं हटती।
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लोहा पीटने के घन चलाती पश्चिमा बाई। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बदलते वक्त के साथ नारी भी बदल चुकी है। समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां महिलाएं मौजूद न हों, शिक्षा के क्षेत्र से लेकर व्यवसाय, खेल से लेकर जंग के मैदानों तक महिलाएं अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। अपनी पहचान बदलने के मामले में सिर्फ बड़े शहरों की महिलाएं ही नहीं छोटे शहरों की महिलाएं भी आगे हैं। घर चलाने के लिए किसी भी काम को करना हो वे कदम पीछे नहीं करती, बल्कि पुरुषों के कंधे से कंधा मिला हर चुनौती को पार करने का जज्बा दिखा रही हैं। मध्य प्रदेश के अगरिया समाज की ग्रामीण महिलाएं लोहा पीटने जैसा कठिन काम कर समाज के सामने एक मिसाल पेश कर रही हैं।
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ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र में रहने वाली अगरिया समाज की महिलाएं मेहनत के मामले में पुरुषों से भी एक कदम आगे हैं। तपती दोपहर में 15 किलो से अधिक का घन उठा वे लोहा पीटती हैं और अपने बच्चों का पेट पालती हैं। अशोकनगर में गुना क्षेत्र से हर साल बारिश के मौसम के बाद अगरिया समुदाय के लोग आते हैं और जगह-जगह डेरा डालकर लोहे के औजार बनाने का काम करते हैं । इस काम में सबसे अधिक मेहनत महिलाओं की होती है। अशोक नगर में काम कर रही पश्चिमा बाई और उनकी दो बहुओं ने बताया कि वह सुबह 6 बजे से पहले उठ जाती हैं, और 1 घंटे में खाना बनाकर फिर वह अपना काम शुरू कर देती हैं। जैसे-जैसे दिन की शुरुआत होती जाती है। धूप बढ़ने के साथ-साथ काम भी बढ़ने लगता है। लेकिन पेट पालने के लिए मेहनत करना ही पड़ती है। वे लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी लोहे के औजार बनाने का काम कर रही हैं। 

बिना थके, बिना रूके जारी है काम 
पश्चिमा बाई ने बताया कि लोहे के औजार बनाने के काम में वे कभी रुकी नहीं, प्रसव के बाद भी वे केवल पखवाड़े भर के आराम के बाद पुस्तैनी काम में लग गई। एक दिन में तकरीबन पांच घंटे से ज्यादा समय तक घन चलाती हैं और लोहे के औजार बनाती हैं। बचा हुआ समय घर के कामों के साथ ही बच्चों की देखभाल में बीत जाता है। सालों से वे अपना जीवन यापन इसी तरह से कर रही हैं।   
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अगरिया समाज की महिलाएं कठिन परिश्रम की एक मिसाल हैं। उनकी मेहनत और जुनून के आगे उम्र का पड़ाव भी थम जाता है। 65 साल की पश्चिमा बाई वृद्धावस्था में भी उसी जोश के साथ घन चलाती हैं जैसे वे अपनी युवावस्था के दौर में चलाया करती थीं। गर्मी की चिलचिलाती धूप में भी वे अपना काम करने से पीछे नहीं हटती। 
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